कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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दोहा—एक हंसके पाछे, + आद नाम सर देख ।
अद्वुत शोभा अकह छिव, कवीरको कला अनेक॥
कवीर है अमरलोकके माहीं । यहां दरद देस जीव बंचाही ॥
जब हम बैठे सप्त पताला । नाथे कालीनाग निसाला ॥
तब नाथिन मोहि विष संचारा । तहैं कबीर गये प्राण उबारा ॥
संगहि आये बलभद्रके भेसा । बालबच्छ राचि मेढेउ अहेसा॥
जब हरनाकुश कीन्होसि वरिआई । तहैं कबीर पुन भये सहाई ॥
रामरूप चेतता हम जांचा । परम जोत कहि बोलेहु बाचा॥
परम जोति कहि कियेउं पुकारा । तहां कबीर आय दुख दारा ॥
दोहा—कबीर सुखदाता जीवके, अमरलोक विश्राम ॥
सो जिव सुख घर पहुँचे, जो सुमरे कबीरको नाम ॥
कलि हमरे जो बोध शरीरा । देवल थापेउ दास कबीरा ॥
तट देवल सिंधु तर गाडा । तब कबीरको ध्यान हम माडा॥
तुरत कबीर प्रगटे तुलसी चौरा । विप्ररूप मैं दर्शनको दौरा ॥
तुलसी चौरा जाय मैं दासा । हंस कबीर अंकम ले परसा ॥
सिंधुतीर गये आसन कीन्हा । सिंधु त्रास भये चरण अधीना॥
बोइल द्वारिका दै मंडपराखा । सत्यकबीरके हम सब साखा ॥
चारों युग भो वार अनेका । सब दिन सत्यकबीर मोहि टेका॥
दोहा—कहैं कृष्ण गुरु गुप्त रासि, कबीर सबनके मूल ।
हम कबीर कहैं सुमरहीं, भक्त मुक्त समतूल ॥