भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 107

कवीरकृष्णगीता ।

९३

दोहा—एक हंसके पाछे, + आद नाम सर देख ।

अद्वुत शोभा अकह छिव, कवीरको कला अनेक॥

कवीर है अमरलोकके माहीं । यहां दरद देस जीव बंचाही ॥

जब हम बैठे सप्त पताला । नाथे कालीनाग निसाला ॥

तब नाथिन मोहि विष संचारा । तहैं कबीर गये प्राण उबारा ॥

संगहि आये बलभद्रके भेसा । बालबच्छ राचि मेढेउ अहेसा॥

जब हरनाकुश कीन्होसि वरिआई । तहैं कबीर पुन भये सहाई ॥

रामरूप चेतता हम जांचा । परम जोत कहि बोलेहु बाचा॥

परम जोति कहि कियेउं पुकारा । तहां कबीर आय दुख दारा ॥

दोहा—कबीर सुखदाता जीवके, अमरलोक विश्राम ॥

सो जिव सुख घर पहुँचे, जो सुमरे कबीरको नाम ॥

कलि हमरे जो बोध शरीरा । देवल थापेउ दास कबीरा ॥

तट देवल सिंधु तर गाडा । तब कबीरको ध्यान हम माडा॥

तुरत कबीर प्रगटे तुलसी चौरा । विप्ररूप मैं दर्शनको दौरा ॥

तुलसी चौरा जाय मैं दासा । हंस कबीर अंकम ले परसा ॥

सिंधुतीर गये आसन कीन्हा । सिंधु त्रास भये चरण अधीना॥

बोइल द्वारिका दै मंडपराखा । सत्यकबीरके हम सब साखा ॥

चारों युग भो वार अनेका । सब दिन सत्यकबीर मोहि टेका॥

दोहा—कहैं कृष्ण गुरु गुप्त रासि, कबीर सबनके मूल ।

हम कबीर कहैं सुमरहीं, भक्त मुक्त समतूल ॥