कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 105, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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तेहि प्रति रामचंद्र दुख पावा । वन २ रटत वचन पितु पावा ॥ वचन सरूप धरे सब देवा । डासन त्रिण भोजन फल मेवा ॥ सिंधु सेत वांधे हरि ताका । पर्वत सबे सिंधु महीं राखा ॥ वांधन लगे सिंधु गंभीरा । तब हरि सुमरे सत्यकवीरा ॥ आय कबीर तुरत दरसावा । कबीर रूप हरि हृदय समावा ॥ रामचंद्रके हृदय कबीरा । आद ब्रह्म कबीर गंभीरा ॥ कबीरके अंस हैं लक्ष्मण वाला । लिखा मेर पर अंक रिसाला ॥ लक्ष्मण अंक सेतु लेहु वांधा । रामचंद्रका छूटा धंधा ॥ उत्तरा सैन लंकागढ दूटा । सकल देवका वंदी छूटा ॥ दीन्हो राज्य विभीषण थापी । कोइ न वांचे राक्षस पापी ॥ सिय बंदिछोर राम लियो संग। । सत्यकबीर प्रताप सुरंगा ॥ सुन खगपति सब देव मुनीसा । सृष्टि कबीर सबन कहैं दासा ॥
दोहा—कहैं कृष्ण सुनु देव मुनि, रक्षक नाम कबीर । हमहिं औसर सुमरहीं जन, गाठे परे शरीर ॥
जीवके सुख देवे कारण । पुरुष कबीर प्रगट कलि सारन ॥ रामनाम गुरु महिमा भाषा । सत्संगतके इच्छा राखा ॥ सत्संगत गुरु मार्ग पाई । गुरु सदुरु मिल ज्यास नसाई ॥ खरा खोटा परख दिखाये । सदुरु सो जिन सत्य चिन्हाये ॥ निर्गुण एक कबीर बखाना । सर्गुण सकल देव मिल जाना ॥ निर्गुण बोलता कबीरको अंसा । रमता राम सकल घट हंसा ॥ कहैं कृष्ण कबीर परजाई । सदुरु सत्य कबीर गोसाई ॥