भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 100

८६

कबीरकृष्णगीता ।

चारों वेदके तारन हारा । पंचयें सुसम वेद सोहंगम तारा ॥ सतकबीरको अंस सोहंगा । स्तुति वेद कबीर प्रसंगा ॥ आज्ञा मान भक्त चित दीन्हा । चार वर्ण भये भक्त अधीना ॥ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य औ शूद्रा । कोई करे भक्त कोई तपमुद्रा ॥ भक्त विना धन वित सब छारा । सतकबीर विनती यम धारा ॥ सत्यकबीर सत्य सो राजी । काम क्रोध मिथ्या यम बाजी ॥ सोहंसा सारपद चाही । अजर अमर जिव अमर व्याही ॥ भजहिं कबीर सो जाहिं अमरपुर । सब सुख विलसहिं कर्म कालदुर भजे सो सत्यकबीर पतिव्रत छवा । तिभिर थिठै जब उदे ज्ञानवा ॥ तिभिर त्रिगुण मन मत सब चारा । सोतहवां अंजोर कबीर मत सार ॥ विष्णु अवरण तुलसी भूषण । मृतुका तिलक काहु नहिंदूषण ॥ अंकुर कंद मूल गुर घीऊ । पान फूलपट सेत सोइ लेऊं ॥

दोहा—मीन मांस जो भखे, तासु अन्न जल नाहिं । साकटको घर भात ताजि, छूट साधको खाइ ॥ एक दिन महाकाल रिसियाना । तीन. लोकमो परा भगाना ॥ सहस्रमुखी तक्षक होइ उठा । जाय इंद्रासन इस इंद्र सुडा ॥ भागे देवता अखिल पताला । वहां सहस्रमुखी जहैं जवाला ॥ दौरे काल कैलासहि आवा । शिव कहैं डंक कीन्ह बहु भावा ॥ बहुर काल धाये वैकुंठा । जै औ विजय सांस धर उठा ॥ खैच उरधके डसेउ बनाई । विष्णुके ढिग दीन्ह गिराई ॥ मृतुक साथ तक्षक गिर तहां । विष्णु व्यास सुखदेव सब जहां ॥