कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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चरण टेक विनवें नभगामी । आज्ञाकरहु सो मागो स्वामी ॥ कहो तो सीस कल्प सुँइ धरऊँ । कहो निजहु तासन परऊँ ॥ हमहू गुरुकी महिमा जाना । गुरुते श्रेष्ठ और नहीं आना ॥ हम त्रिभुवन पातिके सुखपाला । हमरे पीठ जो सदा गोपाला ॥ जब हम देस गोपाल तेहि सेवा । परेउं चरण तर लीन्ह तुव भेवा ॥ दोहा—कहे तक्षक आरि जोर कर, विनय सीस पग राख । काटहु यम कर फाँस प्रभु, गुरुड दीनता भाष ॥
कबीर वचन ।
कहे कबीर सुनो खगराया । मिले ना समर्थ सद्गुरु दाया ॥ आपन जीव सम सब कह लेखे । एके राम सकल घट पेखे ॥ सुर असुरारी चाल निहारे । नीर क्षीर बिलगाइ सुधारे ॥ ज्ञान औ मनकी दशा विचारे । सतपद गहि गुरु सुरत निहारे ॥ जेते आमिष मीन मद मांसू । परधन परनिंदा उपहासू ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन गुरुड सुजाना । अंकुर सुगंध पवित्र फुल पाना ॥ दोहा—गुरु कहैं करता जाने, साधन गुरु कह लेख । कहैं कबीर सुन खगपाति, राम सकल घट देख ॥
गुरुडवचन ।
गुरुड कहे तब सीस नवाई । सत्यकबीर तुम समर्थ साई ॥ तुम्हरे सिखापन हृदय मानो । शरण देहु कहे श्रीमगवानो ॥
कबीरवचन ।
श्रीकृष्ण तुम त्रिभुवन राऊ । गुरुडहि बोधे कहहु सुभाऊ ॥