भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102

८८

कबीरकृष्णगीता ।

इहां वहां गुरु भक्त सुहेखा । गुरु आज्ञा कर सोई चेला ॥ गुरु कहैं आद ब्रह्म कर लेखे । गुरु सरूप संतन कहैं पेखे ॥ गुरु सोई जो तिहुँलोकते न्यारा । सद्गुरु अमरलोक विस्तारा ॥ विष्णु अंस सद्गुरुके आहीं । सद्गुरु सर्वे मई बरताहीं ॥ सद्गुरु सत्यकबीर अविनाशी । रहे निरंतर सब घटवासी ॥ जिभि चंदा नभ कुंभक दीसा । पुनि जिभिरविप्रकाशपद ईसा ॥ एके साहेब सद्गुरु आदी । कीतनउपजी विनासिषटस्वादी ॥ तीन लोककेहैं विष्णु श्रेष्ठा । विष्णुते सत्यकबीर गरिष्ठा ॥ सत्यकबीर सबके सुखदाई । सुरति सुमतिते वै भल पाई ॥

दोहा—सत्यकबीर सुखदाया, जो सुमरे एक चित्त । विष्णु व्यास कहैं सब, ते सुख कबीर प्रतीत ॥

जै जै जै सतनाम कबीरा । सत्यसुक्त सो अजर शरीरा ॥ पुष्पविमान सतलोकते आवा । सकलआयचरणनशिर नावा ॥ निज सिंहासन ठाकुर दीन्हा । चरणपस्वारचरणाभूतलीन्हा ॥ विष्णुव्यास सुखदेव सतव्यासा । सतकबीर पग परस हुलासा ॥ कर जोरे जै हरखित कहहीं । सतकबीर कहत सुख लहहीं ॥ जो सुमरे सतनाम सुखधामा । सच २ सो सद्गुरु नामा ॥ सत्यलोक अम्बर सुचकाया । तहां सो सत्य पुरुष रहाया ॥ बेहंग सोहंग वोहंगके मूला । ओंकार मकारके मूला ॥ कालके कारण करण गोसाई । रक्षपालक सब जिव सुखदाई ॥ तीन लोकते न्यारा रहहीं । सर्वे मई पुन सबसों कहहीं ॥