कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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धरणी अकाश पवन औ पानी । चंद सूर्य जेते नष सानी ॥ सबके आद सोहे सतनामा । सच दया मिल जीवको कामा ॥ सर्वमूल अविनाशी रामा । सोई सतकवीर सुखवाया ॥ जो सुभरे सतनाम कवीरा । ताके काल न आवे निषरा ॥ कीन्हो स्तुति विष्णु बहुता । कहा कवीर वैठहु पूता ॥ तुम स्तुति जब बहुते कीन्हा । तब हम आय दरशतोहि दीन्हा ॥ कौन काज तुम सुभरेहु मोही । टोरो सब संकट जत तोही ॥ परहि कालमुख झरकहि जबहीं । सतकवीर कह चितवे तवहीं ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण पलकन पग झारे । मैं नाती तुम आज्ञा प्यारे ॥ धन्य भाग्य मम शुभ दिन मोश । दीन्हो दरश कवीर बंदीछोरा ॥ कवीरते अधिक और नहि कोई । आद अंत सब जिनते होई ॥ हम सब हैं कवीरके अंसा । सतकवीरके सब निज वंसा ॥ सिद्ध साध मत वेद पुराना । सतकवीर गुण सबहि बखाना ॥ कवीर निरवान मुक्तके दाता । जाको अंत न लखे विधाता ॥
दोहा—सब करताके करता, सब दाताके तार ।
सकल मूल सतसाहेब, सो कवीर औतार ॥
सच २ सच हर गई । सतकवीर जिव रक्षक भाई ॥ ये कवीरको महिमा जानो । और सब मनभत बौरानो ॥ गरुड चरण हरि शीस नवाई । महिमा कृष्ण कवीर परवाई ॥ अस शोभा नहि देखो काहू । करता कृष्ण राम तुव आहू ॥
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