कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 168 में से
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कबीरकृष्णगीता ।
मीन खवाय ज्ञान हर लीन्हा । प्रेतक ईस महादेव कीन्हा ॥ ब्रह्मा कहा जननी परखावा । औरहिं ब्रह्म ज्ञान बतलावा ॥ ब्रह्माहि बधुपुन तुरत जिआवा । मीन मांस भर सुरा खवावा ॥ ब्रह्मा कहैं तब कीन्हेट प्रेता । द्विज तन जगत भेष धर केता ॥ प्रेत अंस औ नौ गृह अंसा । भाषि हैं सखा तुव मांस परसंसा ॥ विष्णु जननी कहैं सीस नवावा । मैं बालक माते बरतावा ॥ भई विष्णु पर मात दयाला । कबीरके हांथ देवाइव माला ॥ कहे अघा कबीरसे रोई । विष्णुहिं चांप सके नहिं कोई ॥
दोहा—ब्रह्मा शिव एक मत भये, विष्णुहिं करिहैं उदास ।
तोहि शरण कबीर हरि, राखि लेहु यहि पास ॥
तुमका अघा सौपहु आज्ञ । हरिकर कीन्ह प्रथम हम काज् ॥
विष्णु साधुकी संगत कीन्हा । ताते हम विष्णुहिं चित दीन्हा ॥
साधु सनेह औ गुरुके सनेही । कबहुँ दोष नहिं आवे तेही ॥
तुमहू अघा सेवहु साधू । गुरुकर मिटे काल उपाधू ॥
सहस्रसुखी सिखवन मान हमारी । हमरी सुरत ध्यान चित धारी ॥
एक काल निरंजन राई । बांचहि हमरे हुकुम चलाई ॥
अष्टंगीवचन ।
कहे अष्टंगी हम तुव चरी । तुम्हरे शरण जीव सब करी ॥
दोहा—सुरतके चौका सर्वारके, दीन्ह अष्टंगी पान ।
आद कला सो लोक गई, कीतम अंस सब जान ॥
सत्यकबीर प्रमारथ बोले । कबीर प्रताप सबे पक्ष खोले ॥