कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 1010 of 1367
Read in contextशेखफरीदका भोजन - मुसलमानोंमें बड़े प्रतिष्ठित महात्मा हुये । बहुत दिनोंतक वृक्षकी पत्तियां खाकर तपस्या करते रहे । एक दिन अपनी माताके निकट गये । माताने पूछा, बेटा ! तू किस प्रकार भजन करता है ? उन्होंने उत्तर दिया कि, वृक्षोंकी पत्तियां खाकर रहता हूँ । माताने शेखजीके दो एकबाल पकड़के खींचे, तब वह सी ! सी !! करने लगे, माताने कहा, ऐ बेटा ! उनको इस प्रकार दुःख न होता होगा ? उस दिनसे शेखजीने वृक्षकी पत्तियां तोड़नी छोड़दी वे काठकी रोटियाँ बाँधे फिरा करते थे ।
शाहू बू अलीकलन्दरके - पांवमें कीड़े पड़ गये, कोई कीड़ा बाहर गिरता तो उसको उठाकर फिर रख लेते, कहते कि, ऐ भाई ! तू किधर जाता है, भूखा मरेगा, तेरा भोजन तो खुदानी यहाँही बनाया है ।
रघुकी दया - सुना था कि, महाराज ! रामचन्द्र रावणको मारकर अयोध्यामें आये । ऋषीश्वरोंसे पूछा कि, मैंने ऐसा कौनसा पुण्य किया था, जिसके बलसे बड़े बलवान शत्रुपर विजय प्राप्त की । ऋषीश्वरोंने उत्तर दिया कि, महाराज ! आपके प्रपिपामह महाराज रघु कहीं चले जाते थे, मार्गमें कुत्तेको तड़पते देखा, उसके शिरमें एक बड़ा कीड़ा पड़ गया था, जो कुत्तेके भेजाको नोच २ कर खाता था, इससे कुत्ता विकल होता था । राजाने वह कीड़ा उसके शिरसे निकाल दिया । कुत्ता सुखी हुआ, पर कीड़ा तड़प २ के मरने लगा । राजाने कीड़ेपर दया करके उसको अपनी जोंघ चौरकर उसमें रख लिया, कीड़ा जोंघमें जाकर सुखी हुआ । उस कीड़ाकी रक्षा करनेके कारण राजाको महान् पुण्य हुआ । उसीके प्रतापसे आपने शत्रुको जय किया ।
सुबुकुतगीनके शाहू होनेका कारण - इसीके अनुसार दूसरा दृष्टान्त लिखता हूँ । जो लेथबूज साहबके भारत इतिहासमें लिखा है कि अल्पतगीनका गुलाम सुबुकुतगीन था । एक दिन घोड़ेपर सवार हो शिकार खेलने गया । जंगलमें एक हरिणीको बच्चासहित देखकर विचार किया कि, बच्चेको जीवित पकड़कर ले चलूँ । घोड़ा बढ़ाकर जालसे बच्चेको पकड़ लिया, उसको लेकर बहुत दूर न गया होगा कि, पीछे फिरकर देखा कि, हरिणी बच्चेके लिये रोती चिल्लाती चली आती है । हरिणीकी इस दशाको देखकर सुबुकुतगीनके मनमें दया आई, बच्चेको छोड़ दिया । हरिणी बच्चा लेकर चली, जैसे जैसे आगे जाती थी पीछे फिर फिरकर देखती जाती थी, उसकी दृष्टिसे ऐसा प्रगट होता था कि, उपकारके बदले हृदयसे धन्यवाद और आशीर्वाद देती चली जाती है । उसी रातको सुबुकुतगीनने ऐसा स्वप्न देखा कि, एक फिरिस्ता उसके सिराने खड़ा होकर कहता है कि, सुबुकुत-