भारतकोश
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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

२० अध्याय । आदि मंगल

शेखफरीदका भोजन - मुसलमानोंमें बड़े प्रतिष्ठित महात्मा हुये । बहुत दिनोंतक वृक्षकी पत्तियां खाकर तपस्या करते रहे । एक दिन अपनी माताके निकट गये । माताने पूछा, बेटा ! तू किस प्रकार भजन करता है ? उन्होंने उत्तर दिया कि, वृक्षोंकी पत्तियां खाकर रहता हूँ । माताने शेखजीके दो एकबाल पकड़के खींचे, तब वह सी ! सी !! करने लगे, माताने कहा, ऐ बेटा ! उनको इस प्रकार दुःख न होता होगा ? उस दिनसे शेखजीने वृक्षकी पत्तियां तोड़नी छोड़दी वे काठकी रोटियाँ बाँधे फिरा करते थे ।

शाहू बू अलीकलन्दरके - पांवमें कीड़े पड़ गये, कोई कीड़ा बाहर गिरता तो उसको उठाकर फिर रख लेते, कहते कि, ऐ भाई ! तू किधर जाता है, भूखा मरेगा, तेरा भोजन तो खुदानी यहाँही बनाया है ।

रघुकी दया - सुना था कि, महाराज ! रामचन्द्र रावणको मारकर अयोध्यामें आये । ऋषीश्वरोंसे पूछा कि, मैंने ऐसा कौनसा पुण्य किया था, जिसके बलसे बड़े बलवान शत्रुपर विजय प्राप्त की । ऋषीश्वरोंने उत्तर दिया कि, महाराज ! आपके प्रपिपामह महाराज रघु कहीं चले जाते थे, मार्गमें कुत्तेको तड़पते देखा, उसके शिरमें एक बड़ा कीड़ा पड़ गया था, जो कुत्तेके भेजाको नोच २ कर खाता था, इससे कुत्ता विकल होता था । राजाने वह कीड़ा उसके शिरसे निकाल दिया । कुत्ता सुखी हुआ, पर कीड़ा तड़प २ के मरने लगा । राजाने कीड़ेपर दया करके उसको अपनी जोंघ चौरकर उसमें रख लिया, कीड़ा जोंघमें जाकर सुखी हुआ । उस कीड़ाकी रक्षा करनेके कारण राजाको महान् पुण्य हुआ । उसीके प्रतापसे आपने शत्रुको जय किया ।

सुबुकुतगीनके शाहू होनेका कारण - इसीके अनुसार दूसरा दृष्टान्त लिखता हूँ । जो लेथबूज साहबके भारत इतिहासमें लिखा है कि अल्पतगीनका गुलाम सुबुकुतगीन था । एक दिन घोड़ेपर सवार हो शिकार खेलने गया । जंगलमें एक हरिणीको बच्चासहित देखकर विचार किया कि, बच्चेको जीवित पकड़कर ले चलूँ । घोड़ा बढ़ाकर जालसे बच्चेको पकड़ लिया, उसको लेकर बहुत दूर न गया होगा कि, पीछे फिरकर देखा कि, हरिणी बच्चेके लिये रोती चिल्लाती चली आती है । हरिणीकी इस दशाको देखकर सुबुकुतगीनके मनमें दया आई, बच्चेको छोड़ दिया । हरिणी बच्चा लेकर चली, जैसे जैसे आगे जाती थी पीछे फिर फिरकर देखती जाती थी, उसकी दृष्टिसे ऐसा प्रगट होता था कि, उपकारके बदले हृदयसे धन्यवाद और आशीर्वाद देती चली जाती है । उसी रातको सुबुकुतगीनने ऐसा स्वप्न देखा कि, एक फिरिस्ता उसके सिराने खड़ा होकर कहता है कि, सुबुकुत-

गीन ! तूने जो हरिनीके बच्चेपर दया की उसके पलटेमें तुझको गजनीकी बादशाहत मिली । चाहिये कि, इसी प्रकार सब जीवधारियोंपर दया करता रहे इसके पश्चात् थोड़ेही दिनोंमें सुबुकुतगीन गजनीका बादशाह होगा ।

महापाप — मुसल्मान कहते हैं कि, हम अपना जबह किया हुआ हलाल समझते हैं, यह उनका कहना एकदम झूठ है । मुर्दा मछलीको किसने जबह किया । मुर्गी बतखके अण्डे आदिकके खानेके लिये कौनसा कलमा उतरा । अपने मारीको हलाल खुदाकी मारीको हराम कहना काफिरका काम है, जीवितको मार डालना महापाप है, जबहकी उसके जीवित करनेकी शक्ति नहीं रखते ।

कुत्तेके बचानेका महापुण्य — किताब दोस्तोंके दूसरे बाबमें यह कहानी लिखी है कि, एक भला आदमी जङ्गलमें चला जाता था. उसने एक कुत्तेको देखा कि, प्यासका मारा मर रहा है । उसने अपने शरसे टोपी लेकर पगड़ीमें बांध पानी भरा कुत्तेको पिलाया, कुत्तेके प्राण बच गये इस पुण्यके प्रतापसे उस समयके पैगम्बरको आकाशवाणी हुई कि, उस पुरुषको इतना पुण्य हुआ है कि, उसका सब पाप नष्ट हो गया । ध्यान देने योग्य बात है, जब एक जीवके बचानेसे इतना पुण्य हुआ तो जान मारनेसे कितना भारी पाप होता होगा ।

यथा-भिहिशती दर्दमन्दा हैं बुजुर्ग । नहीं इन्साँ बा आदते गुर्ग ।।

वही आदम वही हैवान हशरात । वही है और नहीं कुछ दूसरी बात ।।

मुंसी मिश्रका सच्चा सिद्धान्त — मुंसी मिश्र नामका एक बड़ा पण्डित बनारसमें आया । उसने मछलीको अपनी ध्वजामें बांधकर खड़ा कर दिया विज्ञापन दे दिया कि, यदि कोई पण्डित वेदशास्त्रके अनुसार मांस आहारको निषेध ठहरा दे तो मैं उसका सेवक बन जाऊँ । बनारसके सब पण्डितोंने बहुत युक्तियाँ की पर वह परास्त नहीं हुआ । एक दिन पण्डित लोग विचार करके ठीक उसी समय जब कि, गङ्गामें स्नान कर रहा था, उसके पास गये । जाकर कहा कि, महाराज ! इस समय आप गङ्गामें खड़े हैं सत्य कहिये मांस खाना उचित है कि, अनुचित ? मिश्रने कहा कि, जब आप लोग वेदशास्त्रके आधारसे परास्त न कर सकते तो धर्मबद्ध करके परास्त करने आये हैं, अब मैं सत्य कहता हूँ कि, मांस खाना बड़ा भारी पाप है, इतना कह उसी समय पण्डितने मांस त्याग दिया कण्ठी बांधकर बैष्णव हो गया ।

घृणित दुर्गन्धि — मांस आहारी मनुष्य और पशुके शरीरसे ऐसी दुर्गन्धि निकलती है जिससे महाघृणा होती है ।

महात्मा और राजा — एक राजा आखेटको गया, बहुतसी शिकार मारकर

कितनेको जीवित पकड़कर ले चला । रास्तेमें एक महात्मा बैठे, हुआ था. बादशाह उसके निकट जा दण्डवत् करके प्रतिष्ठासे बैठ गया । फिर पूछा की महाराज ! कुछ सेवाकी आज्ञा हो. महात्मा उठा बादशाहकी मोछोंसे २-३ बालोंको पकड़कर उखाड़ लिया. बादशाहको बहुत दुःख हुआ. आज्ञा दी कि, इस फकीरको मार डालो । तब महात्माने कहा, ऐ बादशाह सबकी जान एक समान है. तूने इतने जीवोंको मारा कैद किया है, क्या उनको दुःख नहीं होता होगा ? उनका दुःख परमात्मा न सुनेगा ? इसी प्रकार महात्माने बादशाहको समझाया तो समझ गया, कठोरताके ऐसे कामको छोड़ दिया । उस दिनसे किसी जीवको दुःख न देनेका प्रण करके महात्माका शिष्य होगया ।

कबीर साहिब—भी अहिंसकोंके आशीर्वादमें सर्वशक्ति मानते हैं कि

सूखी अस्थिनको चुमे, जीव न सतावे कोय ।

ता पक्षीकी छाँहतर, क्यों न छत्रपति होय ॥

मांसमें शूरता नहीं—जो लोग ऐसा ध्यान करते हैं कि, मांस खाने और मदिराके सेवन करनेसे मनुष्यमें बल बढ़ता है, शूरता आती है, वे बहुत झूलमें हैं । उनको उचित है कि मुर्गा, बटेरे, बुलबुल आदिककी भयानक लड़ाई देखें मुर्गा और बटेरे लड़ते २ मर जाते हैं पर रणको नहीं छोड़ते । इस प्रकरणमें अबतक जो कुछ निरूपण किया गया है उसीका सार निम्नके गजलमें दिये देते हैं—

गजल—करेगा मिहर जो उसपर मिहर है । क्रहरके एवजमें बेझक क्रहर है ॥

बहर जांदारमें रुहे इलाही । वही रहमान म्यानैं जेरो जबर है ॥

किसीके खूनका बदला न छूटे । सभीके साथ दावर दाद गर है ॥

करम और फ़जल सबपर हैं उसीका । सिताना गैर जाँका पुरखतर है ॥

मिहरबां बाप सारे खल्कका वह । मुसीबत और बला जालिम उपर है ॥

हिसाबोंमें पड़े अमलोंके सारे । न छूटे राम ब्रह्मा विष्णु हर है ॥

न बे गुरज़ान कोई राह पावे । भटकता फिरता यह जीव दर बहर है ॥

है वे मुरशिदके जाहिल आदमी यह । न मर्दुम है वही बेदुमका खर है ॥

हशरके रोज़ खुश मज़लूम सारे । बहर जानिवसे जालिमको ज़रर है ॥

जो खाया गोश्त औरोंका भरजोर । न खा क्यों गोश्त अपना पेटभर है ॥

महासिब रूबरू मालूम होगा । तेरा आमाल नामा हाथ धर है ॥

जिसकी तरफसे दुनियामें है जब । खुदात आलाका वह भी एक नफ़र है ॥

वह भी बन्दा तू बन्दा हो न गन्दा । अता तुझको हुई तेगे ज़फ़र है ॥

दिया तुझको उसीने साजों सामों । तेरी खिदमतकीदी शमसो कमर है॥
जो करे न पसन्द यह जिक्र आजिज । सो जाहिलसे भी जाहिल ख्वारतर है॥

अपेयके पानका निषेध ।

अखाद्यके खानेके निषेधकी तरह अपेयके पानका भी निषेध है, अखाद्यके खानेका तरह अपेयके पानका निषेध किया गया है । अब मुख्य रूपसे इसी विषयका प्रतिपादन करते हैं —

स्वसंवेद—गौ जो विष्ठा भक्षणी, विप्र तमाखू भङ्ग ।
शस्त्र बँधे दर्शनी, यह कलयुगका रंग ॥
कलियुग काल पठाइया, भांग तमाखू फीम ।
ज्ञान ध्यानकी सुधि नहीं कहैं कबीरा तीम ॥
भाँग तमाखू छूतरा, अफीऊन और शराब ।
कबीर कौन करै बन्दगी, यह तो भये खराब ॥
भाँग तमाखू छूतरा, जन कबीर जो खाँहि ।
योग यज्ञ जपतप कियै, सबै रसातल जाँहि ॥
भाँग तमाखू छूतरा, सुरापान ले घँट ।
कहैं कबीर ता जीवकी, धर्मराय शिर कूट ॥
भाँग तमाखू छूतरा, जो इनसे करे पियार ।
कहैं कबीरा जीवसो, बहुत सहे शिर मार ॥
भाँग तमाखू छूतरा, परनिन्दा पर नारि ।
कहैं कबीर इनको तजै, तव पावै दीदार ॥
सुरापान अचवन करे, पिवै, तमाखू भंग ।
कहैं कबीरा रामजन, तामें ढंग कुढंग ॥
सुरापान अचवन करे, पिये तमाकू भंग ।
कहैं कबीरा रामजन, ताको करो न संग ॥
भाँग तमाखू फीमको, दौड़ि २ कर लेहि ।
कहैं कबीर हरि नामको, पीछेही पग देहि ॥
भाँग तमाखूके गौहक, राम नामके नाहि ।
कहैं कबीर जनमें मरे, लख चौरासी माहि ॥
राखें बरत एकादशी, करै अन्नका त्याग ।
भंग तमाखू ना तजै, कहैं कबीर अभाग ॥
हरिजनको सो है नहीं, हुक्का हाथके माहि ।

कहैं कबीरा रामजन, हुक्का पीवैं नाहिं ॥
हुक्का तो सोहैं नहीं, हरिदासनके हाथ ।
कहैं कबीरा हुक्का गहे, ताको छोड़ो साथ ॥
अमल अहारी आतमा, कबहुँ न पावे पार ।
कहैं कबीर विचारिके, त्यागे तत्व विचार ॥
अमलीके बैठो मत, एक पलकहूँ पास ।
संग दोष तोहि लागि है, कहैं कबीरा दास ॥
अमली हो बहु पापसे, समुझत नाहीं अन्ध ।
कहैं कबीर अमलीको, काल चढ़ावे कन्ध ॥
जहैं लग अमल हराम सब, दोऊ दीनके माहिं ।
कहैं कबीरा रामजन, अमली हूजे नाहिं ॥
भोंड़ी आवे बास मुख, हृदया होय मलीन ।
कहैं कबीरा राम जन, माँगि चिलम नहिं लीन ॥
मुखमें थूकन देइ नहिं, महर कोई जनि देहिं ।
कहैं कबीर यह चिलमको, जूँठ जगत मुख लेहिं ॥
छाजन भोजन हक्क है, अमल जो नाहक लेहिं ।
आप तो दोजख जात है, औरन दोजख देहिं ॥
आन अमल सब त्यागिके, राम अमल तब खाय ।
जन कबीर भाजन, भ्रम, औरन कछू सुहाय ॥
राम अमलको छोड़िके, और अमल जो खाय ।
कहैं कबीर तेहि परिहरो, गुरुके शब्द समाय ॥
कबीर प्याला प्रेमका, अन्तर लिया लगाय ।
रोम रोममें रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥

दूसरे दूसरे प्रमाण ।

समस्त वैष्णव धर्मके लोग इसके सहमत हैं कि, मदिरा मत्सोंकी पीनेकी वस्तु है ।

जैन धर्मवाले भी ऐसेही मानते हुए कहते हैं । बौद्ध धर्मवाले भी इसको
वैसाही त्याज्य समझते हैं । इनके हिंदुओंके दूसरे संप्रदाय भी इसके छूने तक
दोष मानते हैं ।

महम्मदके धर्ममें भी सब प्रकारका नशा हराम है।

शराबीकी बुद्धि और अन्तःकरण अशुद्ध हो जाते हैं, उससे कदापि भजन नहीं हो सकता, यही कारण है कि, उसको ज्ञान नहीं मिलता।

पूरबके नीचोंकी सराब पीनेकी रीति—मछपोंकी, रीति है कि, मछ पीनेवाले इकट्ठे होते हैं मंडली बांधकर बैठ जाते हैं, शराबका प्याला हर एकके सामने रखा जाता है, सब लोग मदिराको अपनी उँगलीसे लगाकर माथेमें लगाते हैं, यह चन्दनका चिन्ह है पीछे राम राम कहके प्याला उठाते हैं, यह उस तोतेका चिन्ह हैं क्योंकि, तोता राम राम कहता है। तीसरे जब शराब पीकर उन्मत्त होते हैं, बक झक करते हैं ब्रह्मभूत लगे हुयेके समान चिन्ह प्रगट करते हैं। चौथे बेहोश होते हैं तो नालियों और गंदगियोंके जगह लेटते हैं, यह रीति पूरबदेशके नीच जातियोंमें मेरे सामने १८५९ में प्रचलित थी, इस समय कुछ खबर नहीं कि, है वा नहीं।

नरकका चिन्ह—शराबके अर्थसे प्रगट होता है कि, शराब वह चीज है जिसके पीनेसे बदमाशी और बरबादी प्रगट हो देशी बोलीमें भी इसको मछ कहते हैं, मछ नरकका चिन्ह है।

राक्षस—जब समुद्र मथा गया और शराब निकली यह राक्षसोंको दी गई, इसलिये जो मदिरा ग्रहण करता है वह राक्षस है।

टीटोटेलर (टेम्प्रेन्स) सोसायटी—अंग्रेजोंमें मछ त्यागियोंकी एक मण्डली है, जिसको टीटोटेलर सोसाइटी (Tetotalor Society) और टेम्प्रेन्स सोसाइटी भी कहते हैं। इस सोसायटीकी आज्ञा है कि, जो कोई इस सोसाइटीमें सम्मिलित हो, वह पहले सभी प्रकारके मादक पदार्थोंका त्यागकर इसी प्रकारका एक-रारनामा दाखिल करे कि, मैं आजसे किसी प्रकारका मादक पदार्थ न खाऊंगा, न खिलाऊंगा न दूंगा न दिलाऊंगा न बेचूंगा न बेचवाऊंगा। जो कोई इस प्रकारका प्रतिज्ञा पत्र देता है उसको सोसाइटीमें सम्मिलित करके एक परवाना देते हैं जिसको वह पुरुष अपने पास रखता है जिससे यह प्रमाणित हो कि, यह पुरुष टीटोटेलर सोसाइटीका मेम्बर है।

आधे मरे—मुझको याद आती है कि, मैं किसी लण्डनके अखबारमें पढ़ा था कि, लण्डन शहर नगरमें मछपोंकी गिनती हुई दो तीन वर्ष के बाद फिर जाँचकी गई तो जान पड़ा कि आधेके लगभग, मछप मर गये।

नशेके दोष—(१) नशेबाजका कोई विश्वास नहीं करता और न उसकी कुछ प्रतिष्ठा होती है न वह इस योग्य होता है। (२) नशाके सेवनसे

अन्तःकरण सब प्रकारके पापोंकी तरफ झुकता है। (३) नशेबाजोंके शरीरसे घृणित दुर्गन्धि आती है, मानो साक्षात् नरक जीवित होकर पृथिवीपर फिरता है। (४) नशेबाज दाम देकर लोक परलोककी अप्रतिष्ठा मोल लेता है। (५) तौरैतमें गिनतीकी किताबमें लिखा है कि, जो कोई स्त्री अथवा पुरुष शुद्ध हुआ चाहता है, तो उसे चाहिये कि, वह मदिरा तथा अंगूर आदिकके रससे अलग रहे (६) हूसिआ नबीकी किताबका ४ बाबकी ११ आयतको देखो, हरामकारी और शराब पीना अन्तःकरणकी चतुराई और बुद्धिको नष्ट कर देता है।

प्रतिष्ठित—लूकाकी इच्छीलका १ पहला बाब १५ आयतमें, यहिया नबीका हाल लिखा है कि, वह खुदावनकी नजरमें प्रतिष्ठित होगा जो अंगूरका रस तथा मद्य न पियेगा।

धिवकार तथा आफसोसके पात्र—एसिआ नबीकी किताबका ५ बाब २२ आयत देखो, उनपर धिवकार और आफसोस है जो शराब पीने और मादक पदार्थोंके सेवन करने तथा दूसरोंको सेवन करानेमें बली होते हैं।

अपराधी एसिआह नबीकी २८ बाब और ८ आयतमें देखो—मनुष्य नशासे पाप करते हैं, पाप करके दुखी होते हैं, डगमगाते हैं न्यायके स्थानमें अपराधी ठहरते हैं।

बुद्धिका नाशक—इस बात पर सभी जातियें सहमत हैं कि, बुद्धिही द्वारा लौकिक पारलौकिक सर्व प्रकारकी विद्या प्राप्त होती है, बुद्धिसेही कला कौशल आदि सर्व प्रकारकी चतुराइयाँ मिलती हैं, सांसारिक सुखसे लेकर मोक्ष तक सब सुख प्राप्त करानेवाली वस्तु बुद्धिही है। विचारना चाहिये कि मादक पदार्थोंसे जब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है तो उसके सेवन करनेवालोंके लोक परलोकका क्या ठिकाणा ? मादक पदार्थके सेवनसे ऐसा अमूल्य पदार्थ बुद्धि नष्ट हो जाती है तो इससे बढ़कर दूसरा हराम क्या होगा ? इन्द्रियोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि तथा बुद्धिसे परे आत्मा है आत्माके समीप रहनेवाली तथा समाचार देनेवाली बुद्धि नष्ट हो गई तो वहां के समाचार कौन कहेगा ? इस हेतु जब बुद्धि गई मृत्यु आई विपत्ति सिरपर पड़ी। क्योंकि भगवत्गीतामें लिखा है कि “बुद्धिभ्रंशात् पतिष्यति”।

मांसखोर मद्य नहीं पीते पर मद्य व मांस बिना नहीं रह सकते—मादक पदार्थोंका सेवन मांस आहारसे भी अधिक बुरा है क्योंकि प्रायः कितनेक मांस आहारी मांसको खाते हैं पर मद्य नहीं पीते। ऐसा कोई मद्यप नहीं जो मांस न

खाता हो । इस प्रकार सर्वमद्यप मांस आहारी हैं, यही एक प्रमाण है कि मद्यपान पापों और घृणित कर्मोंका सरदार है । देखो, मुसलमान लोग मांस तो खाते हैं पर शराबियोंसे घृणा रखते हैं, उनकी मुहफिलमें कोई शराबी बैठने नहीं पाता, ऐसेही संयमी और साधुओंकी सङ्गतिमें भी मद्यप नहीं जा सकते

सुलेमान—सुलेमानके इन्सालका २३ बाब, २० आयत देखो उसमें लिखा है कि, तू उन लोगोंके साथ न हो जो मद्यप हैं ।

फिर इसी बाबके ३० आयतसे ३३ आयत तक लिखा है कि, जो देर तक मद्य पीते हैं जो मद्यकी खोजमें रहते हैं उनके ऊपर तथा जब लाल लाल छटा और रंगोंको दीखलाती हुई मदिरा दीख पड़े उसका आकर्षण तुम्हारे अन्तःकरणमें हो तो उसकी तरफ दृष्टि मत डाल, ध्यान मत दे । क्योंकि वह साँपके मानिन्द काटती है, बिच्छूके समान डङ्क मारती है ।

अनेकोंका मांस खाया—जिस समय शराब खींचनेके वास्ते पदार्थोंको सड़ानेके लिये भिगोते हैं तो उसमेंसे अगणित जीव उत्पन्न होते हैं फिर उसको भट्ठी में डालकर मद्य खींचते हैं तो उसके साथ उन कीड़ोंकाभी रस खिंच जाता है । वे सब कीड़े भट्ठीमें मरकर गल जाते हैं । उन्ही जीवधारियोंके अंशसे मदिरा तैयार होती है । जिसने एक गिलास शराब पी लिया उसने करोड़ों जीवधारियोंका मांस खा लिया । मदिराके बनानेमें अनन्त जीवोंकी हिंसा होती है, इस कारण मदिरा बनानेवाले, बेचने वाले और पीनेवाले सभी समान पापी हैं उनसे अच्छे मनुष्य घृणा करते हैं ।

मुहम्मद साहबके अक्षर तथा मद्यकी गन्धसे सभी तप नष्ट—मुहम्मद साहबके समयमें दैत्योंके रहनेकी जगह खैबर थी मुहम्मद साहबने अलीसे कहा कि, ज़िबराईल मेरे पास इस्मआजम लाये थे वह मुझसे सीख जाओ वहाँके खजानेसे धन ले जाओ, यदि तुमसे कोई सामना करे तो उससे लड़ो डरो मत । क्योंकि, इस्मआजम जिसके पास होता है उसकी सर्वदा विजय होती है । अली इस्मआजमको सीखकर वहाँ गये पर विजय प्राप्ति नहीं हुई, क्योंकि, उस गढ़में एक महात्मा रहता था, जिसकी रक्षामें वहाँके रहनेवाले थे । उसी महात्माकी कुपासे कोई किला ले नहीं सकता था । जब हजरत अली किलाको न जीत सके तो मुहम्मद साहबने उन्हें स्वप्नमें उपदेश दिया कि, ऐ अली ! इस शहरमें एक फकीर रहता है उसे किसी न किसी उपायसे शराब खानेके निकट ले जा उसकी नाकमें शराबकी गन्ध आवेगी तो उसका माहात्म्य जाता रहेगा । जागने के बाद अलीने वैसाही किया, उस फकीरकी नाकमें मदकी गन्ध पहुँचतेही

उसका माहात्म्य जाता रहा, उसकी तपस्या और भजनका सब फल नष्ट हो गया। अलीने फिरसे गढ़पर चढ़ाई की, किलेको जीत लिया उस फकीरको भी कत्ल कर दिया। केवल शराबकी गन्धसे उसकी वर्षोंकी तपस्या और भजनका प्रभाव जाता रहा, जो नित्य मद्य पीते हैं उनकी क्या गति हो? यह बेही शोच लें।

फिरस्ते हारूत और मारूतकी शराबसे दुर्दशा—तफसीर अजीजीमें अबिन हरीरा व इब्र हातिम हाकिम, इब्र अब्बास व इब्र अबदुल्लाह और इब्र उम्र आदिकने कहा है कि, अदरीस पअम्बरके समय पापी लोग आसमान पर चढ़े फिरस्ते मनुष्योंसे घृणा करने लगे। खुदाने कहा कि, मनुष्योंमें काम और क्रोध भरा हुआ है, इस कारण उनका मन पापकी अर झुकता है, यहाँतक कि, यदि तुम पृथिवीपर भेजेजाओ तुममें कामक्रोध दिया जावे तो पाप करनेसे तुमभी नहीं बच सकोगे। फिरिस्तोंने खुदाके वचनपर विश्वास न किया कहा कि, हम पृथिवीमें जाकर किसी प्रकारका पाप न करेंगे। खुदाने कहा, तुम जपनेमेंसे ऐसे दो फिरिस्ते भेजो जिसके कि, बिगड़नेकी तुम्हें किसी प्रकारकी शंका न हो, फिरिस्तोंने अपनेमेंसे तपस्या और भजनमें सबसे अधिक प्रतिष्ठित हारूत और मारूत नामक फिरिस्ते खुदाके समक्ष उपस्थित किया। खुदाने उनको पृथिवीपर भेजा कि, तुम जाकर मनुष्योंको उपदेश करो, सावधान कोई पाप न करना। दोनों पृथिवीपर आये, मनुष्योंको उपदेश करने लगे। कुछ दिनोंके बाद एक महासुन्दरी पुंश्चली जुहरा नामक स्त्री पर दोनों आशक्त हो गये उससे अपने कामवृत्तिको प्रगट किया। उसने कहा कि, यदि तुम मुझे चाहते हो तो मेरी चार बातोंमेंसे किसी एकको स्वीकार करो। तब तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। वह चार बातें यह हैं—प्रथम मेरे पतिको बद्ध करो, दूसरी—मेरे बुत्तको दण्डवत् करो, तीसरी—शराब पीओ, चौथी—मुझे इस्मआजम बतलाओ। उन्होंने सब तो महापाप समस्या पर मद्यका पीना सुगम समझकर पीलिया। जब मद्यका नशा चढ़ा तो उसकी प्रतिमाको भी दण्डवत् किया, उसके पतिको मारा, जोहराको इस्मआजम भी सिखला दिया। जुहरा तो इस्मआजमके बलसे आशमानको उड़ गई, पर खुदाने हारूत मारूतके पैरोंमें जंजीर बांधकर बाबुलके कुवेमें लटकवाय दिया। उनपर कयामतके दिन तक नित्य आगके कोड़े पड़ते रहेंगे, प्यासके मारे उनकी जिह्वा बाहर निकल आई है; जिह्वासे एक विलस्तके फासलेपर मीठे पानीका झरना बहता है, उनको वह पानी भी पीनेके लिये नहीं मिलता। वे दोनों शैतानोंको जादू सिखलाया करते हैं शैतान मनुष्योंको बहकाकर पाप लगाता है। शाह अबदुलअजीजे लिखा

जीवहत्या और मांस मंदिराका निषेध

है कि, जो कोई इस कहावतको न मानेगा वह काफिर बनकर खुदाके गजबमें पड़ेगा ।

अंगूरका रस और भांग—कहा गया है कि, पहले अंगूरका रस, शुद्ध था पीछे जब शैतानने उसके जड़पर पिशाब कर दिया तबसे उसमें नशा हो गया । भांगकी जड़ भी शैतानके पिशाबसे सौँची गई है, इसी कारण उसमें शैतानीका, स्वभाव आ गया है, भले आदमियोंको भूल करके भी इसको न छूना चाहिये, छूनेवाला मनुष्य लोक परलोक दोनोंका अपराधी माना जाता है ।

अफीउन और पोस्त—भी वैसाहि निषेध और हराम है ।

तम्बाकू पीना—भी वैसाही पाप और अशुद्ध है ।

शरीअतसे तमाकू पीनेका दण्ड—मुसल्मानों शरीअतमें लिखा है कि, जब मौतेके बाद अजाबकब्र (पापका दण्ड) होगा उस समय हुक्का और तमाखू पीनेवालोंको यह दण्ड मिलेगा कि, उनका शिर नीचे और पैर ऊपरको होंगे । उनके गुदास्थानपर चिलम बनाये जायेंगे, उपस्थ इन्द्रिय नलकी होगी । वह भी उनके मुहमें ही लगी होगी, गुदाके ऊपर आग धर देंगे । कहेंगे कि, अब हुक्का पियो ऊपरसे खूब मुदरोंसे मारेंगे, कहेंगे तम्बाकू हुक्का पीनेका फल लो । वे नारकी चिल्ला २ कर रोवेंगे, पर कोई उनकी नहीं सुनेगा, बरन् जितनेही अधिक रोवेंगे उतनीही अधिक मार पड़ेगी

तमाकू पीनेका दोष—स्कन्ध पुराण ६७ अध्यायमें ब्रह्माजी नारदजीसे कहते हैं कि, हे नारद ! कलियुगके मनुष्य नरकको जायेंगे क्योंकि, वे तम्बाकू पीयेंगे, तम्बाकू पीनेवालोंकी सब तपस्या, भजन, दान, पुण्य आदिक नष्ट हो जाते हैं । जैसे गोमांस भक्षण करना, अपनी माता, गुरुपत्नी और बहनके साथ भोग करना महापाप है वैसेही तम्बाकू पीना भी पाप है, तम्बाकू पीनेवाले के तीर्थ व्रत आदि सब सुकर्म नष्ट हो जाते हैं, उसको चाण्डाल समझो । जैसे, मछ और मांसके भक्षण करनेवाले नरकमें पड़ेंगे वैसेही तम्बाकू पीनेवाले भी नरक जायेंगे । तम्बाकू पीनेवालेका ज्ञान वैराग्य आदि सब नष्ट होजाता है । स्नेच्छ धर्मका विशेष प्रचार होनेके कारण कलियुगमें तम्बाकूकी विशेषता हुई है । जो कोई तम्बाकू पीनेवाले साधु ब्राह्मणको दान देता है वह नरकको जाता है । तम्बाकू पीनेवाला साधु ब्राह्मण गांवका शूकर होता है, जैसे हाथी स्नानकर अपने ऊपर धूल डाल लेता है उसी प्रकार तम्बाकू पीनेवाले लोग सब सुकर्मोंको नष्ट कर लेते हैं । जो साधु और ब्राह्मण होकर दूसरोंको उपदेश करता है पर आप स्वयं तम्बाकू खाता पीता है, वह दूसरोंको नरकमें डालनेका प्रयत्न करता है ।

कर्मका बदला, बदले पर दृष्टान्त

जैसे कि, अभागको सुन्दर स्त्री त्यागकर जाती है वैसेही मादक पदार्थ (शराब, गॉजा, भंग, चरस, तम्बाकू, अफीम, धतूरा, मजूम आदि सर्व मादक पदार्थ) को सेवन करनेवालोंको बुद्धि भी त्यागकर चली जाती है।

मद्यपानके दोष—शराबकी मस्तीमें मा, बहिन, स्त्री, पुत्री आदि किसीका कुछ भी ध्यान नहीं होता, विधि, निषेध हराम हलालका कुछ भी विवेक नहीं होता, शराबके ही कारण लूत जैसा नवी महापापका भागी बना। मद्यप निर्लज्ज और महापातकी होता है उसमें शुभगुणकी गन्ध भी नहीं होती। वह सब शुभ-कर्मों का वैरी है। अहङ्कार और अभिमानसे भरा होता है, अपनेको अपने गुरु और पिता आदिक प्रतिष्ठित पुरुषोंसे बुद्धिमान् तथा अच्छा समझता है। शराबीकी नशेकी हालतमें कुत्ता उसके मुंहपर मूतकर चला जाता है और वह अभाग समझता है कि, मेरे मित्रने गुलाब छिड़का। शराब पीनेवाला, मूत लगे पागलके समान नाचता फिरता है। मद्यपके सब अङ्ग और इन्द्रियाँ ऐसी निर्बल हो जाती हैं कि, कोई काम ठीक ठीक नहीं होता। मदिरा पीनेसे शुद्धि शौच नष्ट हो जाता है। मदिरासे इस प्रकार दया नष्ट हो जाती है जैसे कि, अग्निके लगानेसे घास फूस जल जाते हैं। इसी प्रकार सब मादक पदार्थ दया, क्षमा, सत्य, धैर्य, विचार, शील, सन्तोष, शम, दम आदि सब सद्गुणोंको नष्ट कर देते हैं। ऐसा अवगुण कौन और पाप है जिसको नशेबाज नहीं करता, मादक पदार्थके सेवीसे कभी किसीकी भलाई नहीं हो सकती। शराबी और मादक पदार्थोंका व्यसनी सर्वदाही झूठा माना जाता है। उसको सच्चे भले मनुष्योंकी संगति कदापि नहीं प्राप्त होती।

मदके नशामें पड़ा हुआ मनुष्य पागलोंके समान गाता रोता, हंसता और क्रोध आदिक व्यवहार करता है। मद्य पीकरही कृष्ण भगवान्के पुत्रने दुर्वासा ऋषिकी हँसी की थी जिसके कारण यादवोंका वंश नष्ट हो गया। शराब और अन्य मादक पदार्थोंके सेवन करनेवालोंको किसी शास्त्र और धर्मके बुद्धि-मानोंने अच्छा नहीं गिना है उसकी निन्दाही की है। यदि शराब पुठठोंमें लग जाय तो आदमी फौरन् मर जायगा, यह सर्व रोगोंकी जड़ है मृत्युका चिह्न है लोक परलोकमें अप्रतिष्ठा और दुःख उपजानेवाली है। मदिरा पीनेसे ऐसे ऐसे पापकर्म होते हैं जो कभी नहीं भूलते।

उदाहरण—मैंने किसी किताबमें देखा था कि, फारस मुल्कका एक राहुजावा था। युवा अवस्थामें उसका गवना हुआ। मकसाबेके दिन भली प्रकार मद्य पीकर अपनी स्त्रीके मकान चला। जाते जाते नशेकी तरङ्गोंमें

अभक्ष्य पर कबीरसाहिब

मकानका रास्ता भूलकर एक कबरिस्तानमें चला गया । उसी दिन शामको एक पारसीकी बूढ़ी स्त्री मर गई थी, उसको कफनदेकर सुगन्धी अतर आदिक लगाकर, कबरिस्तानके मकानमें रख आये थे । शाहजादा भी भटकता भटकता कबरिस्तानके उसी मकानमें आगया, नशेकी तरङ्गमें मृतक बूढ़ीकोही अपनी रत्री समझकर जगाना और गुद गुदाना आरम्भ किया पर वह मुरदा कब जागनेवाली थी ? न जागनेपर शाहजादेके मनमें विचार आया कि, आज प्रथम रात्रि है इस हेतु लज्जासे नहीं बोलता । पीछे उसके साथ सम्भोग करने लगा जवानीके जोशमें सबेरैतक भ्रष्ट होता रहा । इधर तो दिनका प्रकाश होने लगा उधर उसका नशा भी उतरने लगा, चेत आनेपर अपनेको कबरिस्तानमें एक बूढ़ी मृतकके साथ लिपटा तथा जिह्वा को उसके मुंहमें डाले हुये देख उसकी लज्जा और पछतावेको क्या कहना था, वह वहाँसे बड़ी चिन्ता, लज्जा, शोक, ग्लानि और घृणाको लिये हुये वहां से चल दिया ।

मदिराके दोषोंपर पाश्चात्य तत्त्वज्ञ—यूरोपियन तत्त्वज्ञोंकी सम्मति है कि, मदिराका नशा सार भागके आधारपर है, यह कारबन, हैड्रोजन और आक्सिजन इन तीन तत्त्वोंसे बनता है ।

कीमियाइस्लाइमें लिखा है कि, दो भाग आक्सिजन, छः भाग हैड्रोजन और चार भाग कारबनसे अलकाहल बनता है । उसका यह गुण है कि, शारीरिक उष्णतापर रक्तकी सञ्चारण गतिको बहुत जोरसे बढ़ाता है, जिससे थोड़ीही देरमें चर्मपर पसीना आजाता है । शरीरकी बिजली घट जाती है, इसका यह नतीजा होता है कि यह आरोग्यताको एकदम नष्ट कर देता है ।

इसका असर मस्तिष्कपर भी पड़ता है कि, यह मस्तिष्कके रगोंमें गरमी डालकर बड़े वेगसे रक्तका सञ्चालन करता है, जिसे मस्तिष्कके ऊपर बड़ा दबाव पड़ता है । थोड़े दिनोंके पीछे मस्तिष्कका तत्व ढीला होजाता है ।

मस्तिष्ककी शाखायें पतली पतली नसें हैं जिनपर मनुष्य की प्रकृति और स्वभावका आधार है वे बिगड़ जाती हैं इसका यह परिणाम होता है कि, मध्यम मनुष्य लड़ाका, झगड़ालू, डरपोक और उत्साह हीन हो जाता है । शरीरके पुट्टोंपर रसदार पदार्थोंको जमानेके कारण उनको बेकार कर देता है शराबियोंके पुट्टे प्रायः ऐसे हुये होते हैं । उनको थोड़ा परिश्रम भी बहुत कठिन जान पड़ता है, हाथ पग अपने वश नहीं रहते, अन्तमें थर थराहटकी बीमारी हो जाती है ।

उसका हड्डियोंपर ऐसा असर होता है कि, उनमें फासफोरस उत्पन्न

नहीं होने देता, उनमें गोंद भी नहीं होने पाता, जिससे हड्डियाँ कठिन और निर्जीव हो जाती हैं जिसका परिणाम गठिया और ध्वजभङ्ग होता है।

चरबी (मज्जा) पर इसका ऐसा असर होता है कि, उनको सुखा देता है अलकाहल यानी मदिराके सारभागका स्वभाव है कि, चरबीको पतला करे यदि थोड़ी हो तो सुखा दे, इसलिये मद्य भी वँसाही करता है।

चमड़े पर इसका असर पड़नेसे उसपर नाना प्रकारके चर्मरोग उत्पन्न होते हैं, वैसेही इन्द्रियोंपर तथा अन्तरीय शक्तियोंपर भी इसका असर होता है थोड़े समयतक तो उनमें गरमी पैदा करके बड़ा जोश और बल पैदा कर देता है, फिर उसी प्रकारसे उसमें पूरी ठण्ढक और सुस्ती आ जाती है।

उपस्थ इन्द्रियोंके रोगोंको फैलानेसे प्रायः मसाना कमजोर हो जाता धातु पतली हो जाती है, विषयकी इच्छा बहुत बढ़ जाती है, पशु वृत्तिमें विशेषता हो जाती है, इस प्रकारसे थोड़े दिनमें मनुष्य नामर्द हो जाता है। मसाना कमजोर हो जाता है, शराबी कभी २ कपड़ोंमें पिशाब भी कर देता है। कलेजेके अन्तरङ्ग तत्वको मिलाकर चरबी बना देता है, खालके अन्दर जा पाचन शक्तिमें मिलकर पाचनशक्तिको नष्ट कर देता है, इसलिये शराबी प्रायः वमन किया करता है, थोड़ेही दिनोंमें उसकी पाचनशक्ति जाती रहती है वह किसी कामकी नहीं रहती। पेटकी शाखायें तथा अंतरियोंके उलटे हो जानेसे कबजकी बीमारी हो जाती है।

कलेजेपर इसका परिणाम—हृदयका काम है कि, भोजनके साथ पिप्त मिलावे और कारबोलिक आदिकको रगोंके द्वारा फेफड़े तक पहुँचावे, शराब उसको कमजोर कर देती है, इस कारण मद्यपोंमेंसे सँकड़े पीछे निश्चानवे हृदयके रोगसे मर जाते हैं।

इसका फेफड़ेपर असर—फेफड़ा अधिक परिश्रमके कारण निर्बल हो जाता है, जिससे तपेदिक (विषमज्वर) दमा तथा सिलकी बीमारी हो जाती है।

धड़कन—हृदय रक्तके उलटने पलटनेके कारण धड़कता रहता है, मद्यप प्रायः सोते २ चिल्ला उठता है, इस प्रकार मद्यपकी जिन्दगी दुःखमय हो जाती है।

आँखोंपर मद्यका परिणाम—यह होता है कि, आँखोंका बल घट जाता है उनमें लाली छा जाती है, उसी तरह कानोंकी शक्ति भी घट जाती है, जिह्वा फूल जाती है, होठोंमें सूजन आ जाती है, जिसके कारण शुद्ध शब्द नहीं निकलता पाँव चलनेसे रह जाते हैं, कामदेवकी शक्ति घट जाती है।

तात्पर्य, अवर्ष

अंग्रेजी मछसे मृत्यु—एक प्रकारकी अंगरेजी मदिरा होती है, जिसमें भङ्ग मिलाते हैं, नशा तेज होनेके लिये कुचला भी मिला दिया करते हैं। हृदयमें उनका विष स्थान बना लेता है उसको कमजोर कर देता है, अन्तमें मनुष्य मर जाता है।

कोढ़की बीमारी—मदिरा पीनेसे कोढ़ उत्पन्न होता है, यह संसारमें दुःख और परलोकमें नरक दिखलाती है। पर मूर्ख मछपोंके लिये अनुपम पदार्थ है।

वृष्टान्त—एक मनुष्य टेम्प्रेसे सुसाइटीका पादरी था, उसके साथ उसके मछप मित्रोंने ठट्ठा किया यानी मछसे एक पीपा भरकर उसके पास भेंटके समान भेज दिया। जब वह पीपा पादरीके समक्ष आया तो उसने शराबको निकालकर एक चीनीके बरतनमें रक्खा। पहले एक शूकरको बुलाया उस बरतनको उसके सामने रख दिया कि, जिसमें शूकर कुछ पिये पर शूकर उसकी बू पातेही घबड़ाकर चिल्लाता हुआ भाग गया, उसने मदिरामें मुंह भी नहीं लगाया। पादरीने एक गदहेको बुलाया, उसके आगे भी वही शराब रखदिया, वह भी गन्ध सृंघतेही भाग गया, कुत्तेने भी वैसेही किया। फिर पादरीने उस मछको उसी पीपेमें भर और मित्रोंके पास भेजकर एक पत्र लिखा कि—

मेरे प्यारे मित्रों ! आपने मेरे पास जो भेंट भेजी उसको मैंने पहले शूकरके सामने रखी, पर उसके सृंघतेही वह विकल होकर भाग गया, पीछे क्रमशः गदहे और कुत्तेके पास भी रखी पर वे भी वैसेही घृणा करते हुए दुःखी होकर भाग गये, जिसको देखतेही कुत्ते, शूकर और गदहे भाग जाते हैं ऐसे घृणित और भयानक पदार्थ स्वीकार करनेवाला इनसे भी अधम होना चाहिये। मनुष्यके ग्रहण योग्य यह पदार्थ नहीं है। इसको तो वेही ग्रहण करे जो अपनेको उन कुत्ते आदिकोंसे भी नीच समझता होगा, इस कारण मैं इस भेंटको अपने यहाँ नहीं रखना चाहता, आपकोही मुबारक हो। यह शराब मनुष्यके लिये विष और विषोंका घर है। इन घृणित निषिद्ध मादक पदार्थोंने मनुष्यको ऐसा अन्धा कर दिया है कि, वे प्रकाशमें भी टटोलते फिरते हैं, उनको बिलकुल नहीं सूझता। सच और झूठका विवेक लोप हो गया।

ऐसेही व्यभिचार, चोरी, झूठ, ईर्षा, कपट, छल, विद्रोह, अभिमान, जूआ, नृत्य, भीख माँगना, भौड़पन आदि घृणित लज्जाहीन जितने कार्य हैं वे सब नर्ककी राह दिखलानेवाले हैं। मुक्तिमार्गके कट्टर शत्रु हैं, जो कोई मुक्ति चाहता है वो इनसे बचता रहे, नहीं तो अवश्य दुःख भोगेगा।

ऋग्वेद, पुरुषसूक्त, सूत्र

नजम—दिल लगा जिसका है बेमकरू हात । है ऊपर उसकेही बला आफात् ।
उसके दिलपर न रोशनीका चिराग । रास्त रहका उसे मिले न सुराग ॥
दिनमें फिरता टटोलते अन्धा । मिसल शबके करीहका बन्धा ।
साधु गुरुकी न उसमें इज्जत है । न खुदादानी उसमें लज्जत है ॥
खोय शैतान् बसूरते इस्मान है । मुजतरिब हाल औ परीशान् है ।
है यही शर्त अकल इन्सानी । कुर्ब उससे किनारा गरदानी ॥
बैठ हरगिज न साथ शैतानके । निजद जामत स्याह बख्तानके ।
सुहबत उनकीसे करसदा परहेज । बैठमत् मुहफिल उनकेसे बरखेज ॥
बल्कि तू हाथसे पकड़ले नाग । इन मुनशिशयोंसे जल्दतर भाग ॥
यही शैतान् तेरा क़ातिल है । ख्वाहिस उनकी ख्याल बातिल है ॥

**विशेषवक्तव्य—**इस भागमें वर्णन किये गये निषिद्ध घृणित दुःख उत्पादक मद्य, मांस तथा अन्य मादक पदार्थ और निषेध नीचकर्म ऐसे निकुट्ट हैं कि, मनुष्यके अन्तःकरणमें ज्ञानके प्रकाशको कदापि नहीं आने देते, जबतक इसका पूर्ण रीतिसे सङ्ग न छूट जावे तबतक सत्यगुरुका दर्शन नहीं होगा । इन निषेध दुष्टकर्मोंमेंसे एकमें भी मन लगा रहेगा तो कदापि ज्ञानका पथ न मिलेगा । ये घृणित पदार्थ तपेश्वरियोंके तपस्याको ऐसा नष्ट करते हैं जैसे आगकी चिनगारी रईको जला देती है । तीनों कालके तपस्वियोंकी संयमियोंकी बाहरी और भीतर शुभकर्मोंको नष्ट करनेमें शूरबीर हैं । यदि प्रगटरूपसे इनसे बचता रहे, पर अन्तरमें इनका बीज और बासना रहे, तो भी ज्ञानका प्रकाश नहीं मिल सकता । अन्तरके शुद्ध न होनेसे कदापि बाहर शुद्ध नहीं हो सकता । किसी अंशमें बाहर शुद्धताकी आवश्यकता नहीं भी होती पर अन्तरङ्ग शुद्धताकी तो अत्यन्त ही आवश्यकता है । कितने ऐसे महात्मा पाये जाते हैं, जिनका कि, बाहर तो देखने में भड़कीला नहीं होता, एवं लोग भी उनकी तरफ विशेष नहीं झुकते पर उनका हृदय ऐसा शुद्ध होता है कि, ईश्वरी ज्ञान का स्थानही होता है ।

इन घृणित पदार्थोंकी ओर सड़कल्प भी न दौड़े तो मनुष्य मुक्तिका अधिकारी हो सकता है । वासनाओंको रोककर इन्द्रियोंको वशकर निषेध पदार्थ और कर्मोंसे अलग रहकर, पूर्ण प्रयत्न करनेपर ही कल्याण की आशा हो सकती है । इस प्रकारसे प्रयत्न करने पर अन्तरिक्षसे सहायता मिलती है । परमात्मा इसकी कोशिश देखकर दयालू होता है । सच्चे अन्तःकरणसे प्रयत्न

ब्रह्मादि ऋषीश्वरोंके वचन मांस निषेधपर

करने पर किसी प्रकारकी रूकावट न हो तभी कार्य सिद्ध होता है तभी भगवान् सिद्धि देते हैं ।

सर्व धर्म

धर्मका प्रयोजन ।

इस लोक और पर लोकमें सुख मिले तथा अन्तमें मोक्ष भी मिल जाय, इस कारण संसारके सभी मतोंके लोग धर्मका अनुष्ठान करते हैं चाहे उन्होंने कुछ भी धर्मका अर्थ मसझ रखा हो पर उनकी श्रद्धा केवल कथित प्रयोजनोंके लिये ही होती हैं, इस कारण सभी मजहबवालोंके यहां धर्माचरणके येही प्रयोजन हैं इन्हींके लिये धर्माचरण है ।

धर्मका स्वरूप

अपनी अपनी मतिके अनुसार सभी धर्मोंके आचार्योंने धर्मके स्वरूपोंकी नियमात्मक कल्पनाएं की उन्हीं नियमोंको धर्म तथा उनके विरुद्धाचरणको अधर्म बतलाया, किसीने उनको ईश्वरकी आज्ञा बतलाई तथा किसीने वही उतरी हुई कहीं एवं किसीने अपनी शून्य समाधिके अकलंक अनुभव बतलाये । उनके अनुयायियोंने उन्हींको धर्म तथा दूसरे कामोंका अधर्म समझा । यहाँतक कि, प्रत्येक मजहबका व्यक्ति अपने पूर्वज धर्मको छोड़ दूसरे धर्मोंको अधर्म समझता है अपने नियमोंको उक्त प्रयोजन सिद्ध करनेवाला तथा दूसरोंके नियमोंको नरकमें पहुँचानेवाला मानता है ।

नियमोंकी आवश्यकता और सत्ता ।

जब कि—शरीर यात्राके निर्वाहके लिये भी नियमोंकी आवश्यकता रहती है और तो क्या आहार, विहार भी बिना नियमके सुखके स्थानमें दुःखका कारण बनते हैं एवं नियमानुसार किये हुए सुखोंके कारण होते हैं तो फिर दूसरों नियमोंका क्या कहना है ? प्रकृतिके पैमाने पर तुले हुए नियम निर्बाध चलते रहते हैं, जैसे दिनके करनेके कृत्य रातको कभी निर्बाध नहीं होते । क्योंकि प्रकृतिने रातको किसी दूसरे कामके लिये नियुक्त किया है । यही कारण है कि, काम करनेके जो प्रकाश आदि प्राकृतिक साधन दिनमें प्राप्त होते हैं वे रातमें प्राप्त नहीं होते, अतः प्रकृतिके अविरुद्ध नियमोंकी प्रत्येक प्राणधारीके लिये आवश्यकता है इसके विरुद्ध नियम, नियम नहीं कहे जा सकते ये नियमही धर्म कहलाते हैं इन्हींमें सारा संसार बँधा हुआ ।

नियमोंके भेद ।

इस प्रकार धर्मोंके दो भेद होगये । एक तो प्रकृतिके विरुद्ध जिनको कि,

हत्याके दोषी

प्रकृति सहन नहीं कर सकती दूसरे वे नियम हैं जो नियतिके नियंत्रणोंके ही परिस्फुट रूप हैं।

ईश्वरीय नियम ।

ईश्वरकी आज्ञा उसकी प्रकृतिके नियमोंके विरुद्ध कभी नहीं हो सकती। क्योंकि, प्रकृति उसीकी है उसीके जिम्मे संसारका निर्माण है अर्थात् उसीसे सब कुछ बना है। इस बातमें किसी भी ईश्वरवादी या खुदाबादी व्यक्तिको इनकार नहीं हो सकता कि, यह दुनिया जगदीशकी बताई हुई है फिर उसके मुखके कहे नियम उससे विरुद्ध कैसे हो सकते हैं? इससे हम इस निश्चय पर पहुँचे हैं कि, जो प्राकृतिक नियमोंका विरोध नहीं करते वे ईश्वरीय नियम हैं वही परमात्माके कहे हुए हो सकते हैं किन्तु जो प्राकृतिक नियमोंका विरोध करते हैं वे नियम परमात्माके बताये हुए नहीं हो सकते चाहे वो किसी भी मजहबके लोगोंने खुदाके भेरे कहकर अपना रखें हों।

परीक्षा ।

पहिली परीक्षा तो यही है कि, वे प्रकृतिके नियमोंके विरुद्ध न होने चाहिये। दूसरे उनमें अपनी आत्माकी सच्ची भावना भी ओतप्रोत होनी चाहिये। जो बात अपनी आत्माके सच्चे स्वरूपके प्रतिकूल हो वह कदापि धर्म नहीं हो सकता। तीसरी बात वह है कि, सबसे ईश्वर वादियोंका परमात्मा है। वह एक है अनेक नहीं हो सकता उसकी आज्ञा एक होगी जिसमें जन साधारणका हित निहित रहता है। यह काम परमात्माका नहीं हो सकता कि, एकको एक काम करनेमें पाप बता दे तथा दूसरेको पुण्य बतावे, उसकी आज्ञा सब मनुष्योंके लिये एक है जो सब धर्मोंमें अदुःखदायी एकसी बात है वही परमात्माकी आज्ञा है दूसरी परमात्माकी आज्ञाएँ नहीं हो सकती किन्तु वे केवल स्वार्थकी भावनासे सनी हुई बातें हैं।

धर्म क्या होता है? धर्म किसे कहते हैं? जब तक यह बात न जानता हो तब तक निकट रहने तथा अति उत्कट सम्बन्ध होनेपर भी उसको पहुँचानना कठिन है।

धारण—संसारमें नानाप्रकारके धर्म प्रचलित हैं। सब कोई अपने अपने धर्मकोही धर्म कहता है उसीको पसन्द करता है। दूसरे धर्मोंको बुरा समझता है। बहुतेरे तो ऐसे हैं जो अपने बाप दादेकी रीति, रस्म और तरीकोंकोही धर्म माने बैठे हैं। इसी प्रकार सब अपने अपने राग गाते हैं पर जबतक अपना सच्चा धर्म न जाना जाय तब तक पशु और मनुष्यमें कुछ भी विभिन्नता नहीं है। यहाँ

मांस त्यागका फल

मैं प्रगट करूँगा कि, अपना धर्म क्या है ? पर धर्म क्या है ? जो लोग अपने कुल रीतिको अथवा किसी विशेष नियमकोही धर्म माने बैठे हैं वे सब भूलमें फँसे हैं । जो नाना प्रकारके एकदेशीमें फँस धर्म द्वेषके लिये मरते मारते, निन्दा स्तुतिमें अपना दिन बिता रहे हैं, वे महान् अज्ञानतामें फँसकर अपने यथार्थ कर्तव्य और धर्मको कभी नहीं पा सकते ।

मत मतान्तरके प्रचारक—कालपुरुषने अनन्त प्रकारके मजहबोंको प्रचलित करके जीवधारियोंको फँसा मारा । यही मुख्य कारण है कि, सब मनुष्य अपने यथार्थ धर्मको छोड़कर कालपुरुषके धोखेमें पड़े हैं उसको पहचान नहीं सकते ।

ज्ञाता—कृष्णचन्द्रने अर्जुनसे महाभारत करवाकर पाण्डवोंको राज्यगद्दी पर बिठा दिया । अन्तमें, कृष्ण भगवान् पाण्डवोंसे अलग होगये और उन्हें उनका धर्म सँभालनेके लिये कहा । स्पष्ट तो उन्हें क्षत्रियोंका धर्म लड़ाई बतलाकर, लड़ाई कराई पर भीतरी औरही आशय रखा । इसका आशय कोई २ साधूही समझते हैं ज्ञानी ही यथार्थ धर्मकी सुधि जानते हैं ।

श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठिधात् ।

स्वधर्म निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

अर्थ—(सद्गुणोंसे युक्त पराये धर्मसे अपना धर्म गुणहीन भी हो तो भी श्रेष्ठ है, अपने धर्ममें मरना श्रेष्ठ है, पराया धर्म भयको प्राप्त करनेवाला है ।

यहां तो श्रीकृष्णचन्द्रने क्षत्रियधर्म बतलाकर अर्जुनको युद्धके लिये प्रस्तुत किया अर्जुनने भी युद्ध और रक्तपातही अपना धर्म समझा, पर श्रीकृष्ण भगवान्ने अर्जुनको इस श्लोकमें योगज्ञान आदिक सिखलाया जिससे धर्म जाननेका मार्ग मिले । प्रगट तो क्षत्रियधर्म बतलाया पर कृष्णके जितने वाक्य होते थे उन सभोंके दो अर्थ, दो भाव और दो आशय हुआ करते थे, मैंने इसी पुस्तकमें श्वपच सुदर्शनजीका वर्णन किया है, कि वह मनुष्य थे उनमें मनुष्यता थी जिसको कृष्ण भगवान्ने प्रगटरूपसे सबको दिखला दिया यह सिद्ध कर दिया कि, उतने लोगोमें सुदर्शनजीके अतिरिक्त कोई सच्चा भक्त मनुष्य न था । जो सच्चे मनुष्य हैं जिन्होंने यथार्थ मनुष्यत्वको पाया है वेही पर और अपर धर्मकी महिमा जान सकते हैं, वही अपना पराया समझ सकते हैं, दूसरा कोई नहीं जान सकता । इसीलिये विवेकवान् विचारवान्को, मनुष्य और अविवेकी मूर्खको पशु कहते हैं ।

अधर्म—काम, क्रोध, लोभ, मोह, युद्ध आदिक मनुष्यके यथार्थ धर्म नहीं, अपना धर्म तो वह है जिससे केवल अपना स्वरूप जाना जावे अपने यथार्थको प्राप्त करे ।

जग जाओ

धर्मकी जड़ ।

गुरु धर्मका मूल है, समस्त स्वसंवेदका कथन है कि, गुरुकी सेवा, अद्वा प्रेम, विश्वास और कृतज्ञतासे भक्ति मुक्ति प्राप्त होती है । गुरुको गोविन्द करके जानने पूजनसे अंतःकरण शुद्ध होकर सर्वज्ञता प्राप्त होती है केवल गुरुही धर्म और परमार्थकी जड़ है । जड़में पानी देनेसे फल फूल और पत्ते शाखा आदि सब पदार्थ पा सकेगा । जहां गुरुकी सेवा भक्ति नहीं वहां धर्मकी जड़ कट जाती है फिर तो 'मूलं नास्ति कुतः शाखा' की बात होती है गुरुकी सेवा पूजाके बराबर कोई तपस्या नहीं है । न भजनही है गुरुकी आज्ञा माननेसे पूरा होता है ।

गुरुपूजा अंगकी साखी ।

शिष्य पूजे गुरु आपना, गुरु पूजे सब साधु ।
कहें कबीर गुरु शिष्य को, मति है अगम अगाधु ॥
गुरु सौंजले शिष्यका, साधु संत को देत ।
कहें कबीरा सौंजसे, लागे हरिसे हेत ॥
गुरु पुजावे साधु को, साधु कहें गुरु पूज ।
अरस परस के खेलमें, भई अगमकी सूज ॥

गुरुभक्ति-जितने शुभकर्म संसारमें प्रचलित हैं सबसे बढ़कर गुरुपूजा है । जिस गुरुके द्वारा भक्ति मुक्ति प्राप्त होती है उसकी समता कौन कर सकता है ? कबीर साहबने बारम्बार कहा है कि, जो पुरुष जितनी गुरुकी सेवा तथा आज्ञापालन करेगा वह उतनीही शुद्धता और ज्ञान प्राप्त करेगा । गुरुसेवा पूर्णताको पहुँचाती है गोविन्द उसी गुरुकी मूर्तिसे प्रकट होकर काम पूरा कर-देता है । हों ध्यानकी पूरी निमग्नतामें गुरुकी सेवा नहीं हो सकती पर गुरुका ध्यान हो सकता है । ऐसी दशामें गुरुकी बारम्बार स्तुति कृतज्ञता और प्रार्थना करना उचित है जो कुछ ज्ञान तथा प्रकाश प्राप्त हो सब गुरुकी कृपासे ही हुआ समझना चाहिये जन्मभर गुरुकी कृतज्ञता माने कभी कृतघ्न न बने । दान, पुण्य, योग, याग, पूजा पाठ और व्रतादि सब कार्य गुरुकी आज्ञानुसार करे । गुरुसे बढ़कर दूसरा दानपात्र कौन है संसारमें नानाप्रकारके दुःखी जीव तो सदाही मिलते हैं पर गुरु सदा कहाँ प्राप्त होते । गुरुकी सेवा किसी महाभाग्य-वानको प्राप्त होती है । जिसको गुरु प्राप्त हो उसका धन्य भाग्य है । क्योंकि, गुरुकी सेवासे सब बन्धन छूट जाता है जो अपने गुरुके साथ, कपट, छल, झूठ, अभिमान, मान बढ़ाई हुशियारी चालाकी करता है, वह बड़ा अभागा है । गुरुको भी सब प्रकारसे शिष्यका बोध एवं सब शंका निवृत्त करना उचित है ।

श्रद्धा विश्वास—शिष्यको गुरुके उचित वाक्य पर विश्वास श्रद्धा रखना मुनासिब है । क्योंकि, गुरुके वचनकी श्रद्धाही भक्ति मुक्तिको प्राप्त कराती है । विश्वास श्रद्धाहीके साथ गुरु है, श्रद्धा विश्वासके छूट जानेपर नहीं रहती, विश्वास श्रद्धाही पर गुरु बैठा है । मुहम्मद साहबके नूरनामेमें लिखा है कि, खुदाने यकीनका एक वृक्ष उत्पन्न किया उसके ऊपर मुहम्मदकी रुहको मोरके समान बैठाया ।

आदि भक्ति शिवयोगी केरी । राखी गुप्त न जगमें फेरी ।

आदि गुरु विश्वासके वृक्षपर बैठाया गया, इस लिये गुरुकी बैठक वहीं हुई । जहाँ विश्वास नहीं, वहाँ गुरु नहीं, इसी लिये सब गुरुमुख लोगोंको ताकीद की गई है कि, अपने २ गुरुपर श्रद्धा विश्वास रखो यदि विश्वास नहीं रहेगा तो गुरुभी नहीं रहेगा । समस्त स्वसंबेद पुकारता है कि, गुरुको छोड़कर गोविन्दको कदापि नहीं पावेगा ।

गुरुदर्शन—चेलाको उचित है कि, गुरुका नित्य दर्शन करे । नित्य न हो सके तो दूसरे तीसरे दिवस तो अवश्यही करे, वह भी न हो सके तो सप्ताह अथवा पन्द्रह दिनमें जरूर करे । यदि पक्षपक्ष भी दर्शन न हो तो महीनामें एक बार, यदि यह भी न हो सके तो तीसरे महीने, यदि किसी कारण ऐसा भी न हो सके तो छठे महीने भेट पूजा सहित गुरुका दर्शन जरूरही करने जावे । यदि छठे महीने भी न हुआ तो वर्षमें दिन तो अवश्य सेवा बजावे । यदि वर्षमें दिवस भी गुरुकी सेवा पूजा न कर सके तो उसका कहीं भी ठिकाना नहीं । जैसे वृक्ष बिना जलके सूख जाता है उसी प्रकार चेला गुरुके दर्शन बिना अशुद्ध अंतः-करणका हो जाता है ।

गुरुमुखका कृत्य—इस संसारमें दो प्रकार मनुष्य हैं । गुरुमुख और मनमुख । गुरुमुख वे लोग हैं जो कि, गुरुकी सेवामें किसी प्रकारकी भी त्रुटी नहीं करते सर्वदा गुरुकी आज्ञा पालनमें ही लगे रहते हैं गुरुकी आज्ञाको पूर्णरीतिसे समझने और उसपर चलनेवाले पुरुष, पारखपदको प्राप्त होकर, सत्यपदको पहचान लेते हैं, ऐसेही मनुष्य अपना तन मन धन सब सत्यके लिये अर्पण करते हैं ।

मनमुख—वे लोग हैं जो गुरु और गुरुकी वाणीका कुछ आदर नहीं करते जो मनमें आता है वही करते हैं । ऐसे पुरुष अव्यवस्थित चित्तके होते हैं इसी कारण स्वेच्छाचारी तथा दूषित हृदयके भी होते हैं । मनमुख मान बड़ाई और वृथा अभिमानसे ग्रस्त होते हैं ।

दोनोंके कृत्य—गुरुमुख ईश्वर पूजक है और मनमुख बुत्तपरस्त है गुरुमुख