कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1024, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनजम—दिल लगा जिसका है बेमकरू हात । है ऊपर उसकेही बला आफात् ।
उसके दिलपर न रोशनीका चिराग । रास्त रहका उसे मिले न सुराग ॥
दिनमें फिरता टटोलते अन्धा । मिसल शबके करीहका बन्धा ।
साधु गुरुकी न उसमें इज्जत है । न खुदादानी उसमें लज्जत है ॥
खोय शैतान् बसूरते इस्मान है । मुजतरिब हाल औ परीशान् है ।
है यही शर्त अकल इन्सानी । कुर्ब उससे किनारा गरदानी ॥
बैठ हरगिज न साथ शैतानके । निजद जामत स्याह बख्तानके ।
सुहबत उनकीसे करसदा परहेज । बैठमत् मुहफिल उनकेसे बरखेज ॥
बल्कि तू हाथसे पकड़ले नाग । इन मुनशिशयोंसे जल्दतर भाग ॥
यही शैतान् तेरा क़ातिल है । ख्वाहिस उनकी ख्याल बातिल है ॥
**विशेषवक्तव्य—**इस भागमें वर्णन किये गये निषिद्ध घृणित दुःख उत्पादक मद्य, मांस तथा अन्य मादक पदार्थ और निषेध नीचकर्म ऐसे निकुट्ट हैं कि, मनुष्यके अन्तःकरणमें ज्ञानके प्रकाशको कदापि नहीं आने देते, जबतक इसका पूर्ण रीतिसे सङ्ग न छूट जावे तबतक सत्यगुरुका दर्शन नहीं होगा । इन निषेध दुष्टकर्मोंमेंसे एकमें भी मन लगा रहेगा तो कदापि ज्ञानका पथ न मिलेगा । ये घृणित पदार्थ तपेश्वरियोंके तपस्याको ऐसा नष्ट करते हैं जैसे आगकी चिनगारी रईको जला देती है । तीनों कालके तपस्वियोंकी संयमियोंकी बाहरी और भीतर शुभकर्मोंको नष्ट करनेमें शूरबीर हैं । यदि प्रगटरूपसे इनसे बचता रहे, पर अन्तरमें इनका बीज और बासना रहे, तो भी ज्ञानका प्रकाश नहीं मिल सकता । अन्तरके शुद्ध न होनेसे कदापि बाहर शुद्ध नहीं हो सकता । किसी अंशमें बाहर शुद्धताकी आवश्यकता नहीं भी होती पर अन्तरङ्ग शुद्धताकी तो अत्यन्त ही आवश्यकता है । कितने ऐसे महात्मा पाये जाते हैं, जिनका कि, बाहर तो देखने में भड़कीला नहीं होता, एवं लोग भी उनकी तरफ विशेष नहीं झुकते पर उनका हृदय ऐसा शुद्ध होता है कि, ईश्वरी ज्ञान का स्थानही होता है ।
इन घृणित पदार्थोंकी ओर सड़कल्प भी न दौड़े तो मनुष्य मुक्तिका अधिकारी हो सकता है । वासनाओंको रोककर इन्द्रियोंको वशकर निषेध पदार्थ और कर्मोंसे अलग रहकर, पूर्ण प्रयत्न करनेपर ही कल्याण की आशा हो सकती है । इस प्रकारसे प्रयत्न करने पर अन्तरिक्षसे सहायता मिलती है । परमात्मा इसकी कोशिश देखकर दयालू होता है । सच्चे अन्तःकरणसे प्रयत्न