भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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करने पर किसी प्रकारकी रूकावट न हो तभी कार्य सिद्ध होता है तभी भगवान् सिद्धि देते हैं ।

सर्व धर्म

धर्मका प्रयोजन ।

इस लोक और पर लोकमें सुख मिले तथा अन्तमें मोक्ष भी मिल जाय, इस कारण संसारके सभी मतोंके लोग धर्मका अनुष्ठान करते हैं चाहे उन्होंने कुछ भी धर्मका अर्थ मसझ रखा हो पर उनकी श्रद्धा केवल कथित प्रयोजनोंके लिये ही होती हैं, इस कारण सभी मजहबवालोंके यहां धर्माचरणके येही प्रयोजन हैं इन्हींके लिये धर्माचरण है ।

धर्मका स्वरूप

अपनी अपनी मतिके अनुसार सभी धर्मोंके आचार्योंने धर्मके स्वरूपोंकी नियमात्मक कल्पनाएं की उन्हीं नियमोंको धर्म तथा उनके विरुद्धाचरणको अधर्म बतलाया, किसीने उनको ईश्वरकी आज्ञा बतलाई तथा किसीने वही उतरी हुई कहीं एवं किसीने अपनी शून्य समाधिके अकलंक अनुभव बतलाये । उनके अनुयायियोंने उन्हींको धर्म तथा दूसरे कामोंका अधर्म समझा । यहाँतक कि, प्रत्येक मजहबका व्यक्ति अपने पूर्वज धर्मको छोड़ दूसरे धर्मोंको अधर्म समझता है अपने नियमोंको उक्त प्रयोजन सिद्ध करनेवाला तथा दूसरोंके नियमोंको नरकमें पहुँचानेवाला मानता है ।

नियमोंकी आवश्यकता और सत्ता ।

जब कि—शरीर यात्राके निर्वाहके लिये भी नियमोंकी आवश्यकता रहती है और तो क्या आहार, विहार भी बिना नियमके सुखके स्थानमें दुःखका कारण बनते हैं एवं नियमानुसार किये हुए सुखोंके कारण होते हैं तो फिर दूसरों नियमोंका क्या कहना है ? प्रकृतिके पैमाने पर तुले हुए नियम निर्बाध चलते रहते हैं, जैसे दिनके करनेके कृत्य रातको कभी निर्बाध नहीं होते । क्योंकि प्रकृतिने रातको किसी दूसरे कामके लिये नियुक्त किया है । यही कारण है कि, काम करनेके जो प्रकाश आदि प्राकृतिक साधन दिनमें प्राप्त होते हैं वे रातमें प्राप्त नहीं होते, अतः प्रकृतिके अविरुद्ध नियमोंकी प्रत्येक प्राणधारीके लिये आवश्यकता है इसके विरुद्ध नियम, नियम नहीं कहे जा सकते ये नियमही धर्म कहलाते हैं इन्हींमें सारा संसार बँधा हुआ ।

नियमोंके भेद ।

इस प्रकार धर्मोंके दो भेद होगये । एक तो प्रकृतिके विरुद्ध जिनको कि,