कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1013, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिया तुझको उसीने साजों सामों । तेरी खिदमतकीदी शमसो कमर है॥
जो करे न पसन्द यह जिक्र आजिज । सो जाहिलसे भी जाहिल ख्वारतर है॥
अपेयके पानका निषेध ।
अखाद्यके खानेके निषेधकी तरह अपेयके पानका भी निषेध है, अखाद्यके खानेका तरह अपेयके पानका निषेध किया गया है । अब मुख्य रूपसे इसी विषयका प्रतिपादन करते हैं —
स्वसंवेद—गौ जो विष्ठा भक्षणी, विप्र तमाखू भङ्ग ।
शस्त्र बँधे दर्शनी, यह कलयुगका रंग ॥
कलियुग काल पठाइया, भांग तमाखू फीम ।
ज्ञान ध्यानकी सुधि नहीं कहैं कबीरा तीम ॥
भाँग तमाखू छूतरा, अफीऊन और शराब ।
कबीर कौन करै बन्दगी, यह तो भये खराब ॥
भाँग तमाखू छूतरा, जन कबीर जो खाँहि ।
योग यज्ञ जपतप कियै, सबै रसातल जाँहि ॥
भाँग तमाखू छूतरा, सुरापान ले घँट ।
कहैं कबीर ता जीवकी, धर्मराय शिर कूट ॥
भाँग तमाखू छूतरा, जो इनसे करे पियार ।
कहैं कबीरा जीवसो, बहुत सहे शिर मार ॥
भाँग तमाखू छूतरा, परनिन्दा पर नारि ।
कहैं कबीर इनको तजै, तव पावै दीदार ॥
सुरापान अचवन करे, पिवै, तमाखू भंग ।
कहैं कबीरा रामजन, तामें ढंग कुढंग ॥
सुरापान अचवन करे, पिये तमाकू भंग ।
कहैं कबीरा रामजन, ताको करो न संग ॥
भाँग तमाखू फीमको, दौड़ि २ कर लेहि ।
कहैं कबीर हरि नामको, पीछेही पग देहि ॥
भाँग तमाखूके गौहक, राम नामके नाहि ।
कहैं कबीर जनमें मरे, लख चौरासी माहि ॥
राखें बरत एकादशी, करै अन्नका त्याग ।
भंग तमाखू ना तजै, कहैं कबीर अभाग ॥
हरिजनको सो है नहीं, हुक्का हाथके माहि ।