भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1014, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1014

कहैं कबीरा रामजन, हुक्का पीवैं नाहिं ॥
हुक्का तो सोहैं नहीं, हरिदासनके हाथ ।
कहैं कबीरा हुक्का गहे, ताको छोड़ो साथ ॥
अमल अहारी आतमा, कबहुँ न पावे पार ।
कहैं कबीर विचारिके, त्यागे तत्व विचार ॥
अमलीके बैठो मत, एक पलकहूँ पास ।
संग दोष तोहि लागि है, कहैं कबीरा दास ॥
अमली हो बहु पापसे, समुझत नाहीं अन्ध ।
कहैं कबीर अमलीको, काल चढ़ावे कन्ध ॥
जहैं लग अमल हराम सब, दोऊ दीनके माहिं ।
कहैं कबीरा रामजन, अमली हूजे नाहिं ॥
भोंड़ी आवे बास मुख, हृदया होय मलीन ।
कहैं कबीरा राम जन, माँगि चिलम नहिं लीन ॥
मुखमें थूकन देइ नहिं, महर कोई जनि देहिं ।
कहैं कबीर यह चिलमको, जूँठ जगत मुख लेहिं ॥
छाजन भोजन हक्क है, अमल जो नाहक लेहिं ।
आप तो दोजख जात है, औरन दोजख देहिं ॥
आन अमल सब त्यागिके, राम अमल तब खाय ।
जन कबीर भाजन, भ्रम, औरन कछू सुहाय ॥
राम अमलको छोड़िके, और अमल जो खाय ।
कहैं कबीर तेहि परिहरो, गुरुके शब्द समाय ॥
कबीर प्याला प्रेमका, अन्तर लिया लगाय ।
रोम रोममें रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥

दूसरे दूसरे प्रमाण ।

समस्त वैष्णव धर्मके लोग इसके सहमत हैं कि, मदिरा मत्सोंकी पीनेकी वस्तु है ।

जैन धर्मवाले भी ऐसेही मानते हुए कहते हैं । बौद्ध धर्मवाले भी इसको
वैसाही त्याज्य समझते हैं । इनके हिंदुओंके दूसरे संप्रदाय भी इसके छूने तक
दोष मानते हैं ।