कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1034, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै कि, मेरी पूजा करो, सुननेवाला भी यही समझता है कि जो ईश्वर मुझसे बातकर रहा है उसीकी पूजा उचित है। वक्ता श्रोता दोनोंके आशय और संमति उनके अनुसारही है।
समोक्षा—पर मेरी सम्मति तो एक ईश्वरकी पूजाके ावषयमें यह है कि जो कुछ आँखोंसे देखा जाता है, कानोंसे सुना जाता है, स्पर्श किया जाता है, रस लिया जाता है, संधा जाता है अथवा किसी बाहरी वा भीतरों ज्ञानेन्द्रियसे कर्म अनुभव होता है यह सब द्वैतरूप माया है। वहाँ अद्वैतका पता नहीं बरन् अनेक हैं। अतः हजरत मूसाने खुदाकी बातको अपने कानसे सुना खुदाको अपने आँखोंसे देखा। जो देखा सुना जाता है वह द्वैत है, अद्वैतमें नहीं है। इससे मूसाने खुदाको अपनी आँखोंसे देखा उससे जो कुछ सुना सब माया ही हुई। मूसाने मायाहीकी आज्ञाको माना। एक खुदाको न किसीने देखा और न किसीने उसका वचन सुना। क्योंकि, अन्तरदृष्टिसे जो कोई एक ईश्वरको देखता है तो उसको खुदाको देखने एवं उसके वचनको सुननेकी आवश्यकता नहीं होती। वह सबमें सब जगह एक समान वर्तमान है फिर किसका वचन सुनें, किसको देखें। उनके अपने ही मन और वचनसे खुदाके वचन खण्डित होते हैं। क्योंकि भीतर और बाहर तो सब वही है। परमात्मा सदा वर्तमान है फिर किस विशेष स्थानमें जाकर ईश्वरका वचन सुनें एवं सुननेका मुहताज बनें, श्रोताकी ऐसी क्या जरूरत है।
निराकार निरवयवका पता नहीं—यदि मूसा अपने अन्तरकी ज्ञान-दृष्टिसे ईश्वरको पहचानते उसके पदको जानते तो अवश्य वर्णन करते कि यह खुदा कौन है। किधरसे आया? किधरको गया? उसको रहनेकी जगह कहाँ है? क्या सामर्थ्य रखता है? विस्तारसे सारा हाल प्रगट हो जाता, कदापि न छिपा रहता। अरबदेशमें जितने विश्वासी पेंगम्बर हुये किसीने इस खुदाका विस्तृत वृत्तान्त प्रगट नहीं किया केवल प्रकाश और थोडा सामर्थ्य देखकर उसकी आज्ञा मानते आये। किसीने उसको न पहचाना। सब एक दूसरे की बातपर विश्वास करते चले आये। केवल बाहरी भड़क देख लो, भीतरी भेदको किसीने नहीं जाना। ऐसा अन्तरप्रकाश उनमेंसे किसीको नहीं हुआ कि यथार्थ को मालूम कर सके जिस खुदाके शासनको मूसाने माना उसी खुदाकी भक्ति आदमसे लेकर आजतक सब करते आते हैं। उसी खुदाकी आज्ञायोंको मानना अपना धर्म सममत है यही उनका विश्वास है। जो कुछ उन पीर पेंगम्बरोंने देखा वह सब भ्रम है, वह बेचून बेचारा खुदा यानी निराकार निरवयव परमात्मा