भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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इन तीनों अक्षरोंके आशयको भली प्रकार समझ लें कि ये तीनों क्या चीज हैं कहाँसे हुये ? जब तक इन तीनों अक्षरोंके आशयकी सुधि न हो, तब तक वेद पाठ निष्फल है । यदि शुक्ले रामराम कहना सीख लिया तो क्या हुआ ? जो कोई पण्डित इन तीन अक्षरोंके अर्थको नहीं जानता उसके हृदयमें विद्या प्रकाश उत्पन्न नहीं कर सकती, जब कि अक्षरोंके ही अर्थको न समझे तो शब्दोंके आशयको कैसे समझेगा ? जो शब्दोंके यथार्थ अर्थको न समझे वह वेदके मन्त्रोंके अर्थको नहीं समझ सकता । जो कोई वेद मन्त्रोंके बहुत अर्थ करता हो यथार्थ आशयको न जानता हो, वह मेरे विचारमें वेदपाठी नहीं हो सकता । अपनेको वेदपाठी कहता फिरा इससे क्या हुआ ? वह झूठा है । तीनों लोक और चारों वेद एक शब्द अँ से उत्पन्न हुये हैं । सो अँ अँ तीन अक्षर—अ, अँ, म, के संयोग से बना है । जो कोई इस अँ कारके यथार्थ भेदको सम ता हो वही आत्म ज्ञानका अधिकारी हो सकता है, कहे हुये तीनों अक्षर पांच स्वरूपोंमें प्रगट होते हैं इस प्रकारसे लिखे जाते हैं अथवा ओम् यह इनका यथार्थ स्वरूप है । इस स्वरूपसे पांच स्वरूप बनते हैं—अ—उ—म—ॐ— फिर यह पांचों रूप—ओम् में संयुक्त हैं, जो इन पांचोंकी यथार्थताको जाने उनके अर्थको भलीप्रकार समझ बूझकर व्याख्यान करे, समझे समझावे, वह अवश्य वेदका अर्थ करनेवाला कहा जा सकता है । जो इन पांचोंके यथार्थ भेदसे बेसुध हैं, वे कदापि वेदपाठी नहीं किन्तु मनुष्योंको धोखा देते फिरते हैं । पहले एक—अ—था फिर दूसरा, तीसरा, चौथा और पांचवाँ रूप हुआ । एकसे अनेक हो गया । असल क्या है ? नकल क्या है ? एक क्या है अनेक क्या है ? एक किये कहते हैं ? अनन्त किये कहते हैं ? चार वेदका शिर और सार केवल अँ कार है चार वेद उसकी देह है । इस कारण जो अँ कारके भेदको जानेगा वही ईश्वरी भेदसे विज्ञ होगा । वेदके शिर और भेदको बिना जाने, वेद पाठसे कुछ भी प्राप्त न होगा । साधू लोग केवल एक प्राणकाही अभ्यास करते हैं उसीसे चारों वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं । पण्डितलोग चारों वेद रटतेही रहते हैं पर उसके भेदसे अनभिज्ञही रह जाते हैं । जो कोई वृक्षकी जड़में पानी देता है उसके हाथोंमें समस्त वृक्ष, फूल, फल आदि आजाता है—जो कोई पत्तों २ पर फिरता है उसको वृक्ष नहीं प्राप्त होता । केवल शिरमेंही यथार्थ भेद है, शिर बिना देहके तुच्छ है । शिर सहित देह सत्यपुरुषकी है, शिर रहित देह कालपुरुषकी है । जो वेदके सशिर देहसे ज्ञान प्राप्त करेगा, उसे सर्वोद्धारक मिलेगा । जो बिना शिरके वेदको पढ़ेगा उसको अत्याचारी मिलेगा वेदको बिना — शिर (अँकार) के पढ़नेवाले कालके भक्ष