भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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शुद्धताके बिना अहंकृत बुद्धि, अज्ञान पथमें डाल देती है। जिसे वे ज्ञानके पथसे निराश रह जाते।

उपदेशके अयोग्य—ये विद्याभिमानी लोग सच्चे नहीं कहे जा सकते, बरन्पेटके लिये उद्यम करते हैं। सैकड़ों विद्याभिमानियोंपर एक अपढ़ सन्तका विचार जय पावेगा, इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, जो तत्त्ववेत्ता विद्वान् नहीं अपने कहनेके अनुसार चलनेवाला नहीं उसके वचनपर विश्वास करना अपनेको कुमार्गमें डालना है। सन्त लोग विद्याभिमानियोंको उपदेश भी नहीं देते। क्योंकि उनका अन्तःकरण सांसारिक ज्ञानसे भरा रहता है। पुराने अह्वनामके २८ के बाबसालिब नबीके वृत्तान्तामें लिखा है कि, वह एक औरतसे जिसका कि मित्र एक राक्षस था कुछ समाचार पूछने गया इसी कारण उसका ज्ञान लुप्त हो गया।

इसी प्रकार सब मनुष्योंकी दशा है। जिस अन्तःकरणमें अभिमानने स्थान किया, वह अन्धकारमय पत्थरके समान कठोर हो गया, वह कभी सुधारने योग्य नहीं होता। बड़े २ विद्वान् लुकमान, अफसातून अस्तू सुकरात आदिकोंको सच्चे सन्तोंके उपदेशके बिना बहुत दुख भोगना पड़ा, हिकमत तथा रसालत राज्य आदिक सबका अन्तिम परिणाम शोक एवं निराशाही है।

गजल - जितने उल्माजमीं ऊपर न जाने क्या खुदाई।

शरीतकी सलाई उनकी आँखोंमें चलाई है ॥

यह हरदो ऐन अन्धे हैं सो यम जालिमके बन्दे है ॥

फकीरोंके कदमकी खाक आँखोंमें न पाई है ॥

हजो करके फकीरोंके हैं आशिक राहगीरोंके।

ठगोंकी दोस्ती करके गला अपना कटाई है ॥

दरूनी और बेरूनी आँख रौशन मिसल सद सूरज।

जो दर्वेशन खाक पायेका सुरमा बनाई है ॥

जो इस दुनियाके दाना सब हैं ओकबा महज नादानसो।

खबरदारान इश्क आलम खबर ऐसी सुनाई है।

पकड़ जब लेवे मलकुलमौत भूलें सारी दानाई है।

जो गन्धक आगके घर बीचमें डेरा बनाई है ॥

न जबतक वारते फुकरापर तनमन और धन आजिज।

करें तदबीर सो सदहा सो कहाँ राहे रहाई हैं ॥