कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1093, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर – एक दिना नहिं करिसके, दूजे दिन करि लेहि ।
सद्गुरु दरशनके किये, पावे उत्तम देहि ॥
कबीर – दूजे दिन ना करि सके, चौथे दिन कर जाय ।
सद्गुरु दरशनके किये, मोक्ष मूक्ति फल पाय ॥
कबीर – बार बार ना करि सके, पक्षे पक्ष करे सोय ।
कहैं कबीर ता दासका, जन्म सुफलही होय ॥
कबीर – पक्षे पक्ष ना करि सके, मास मास कर धाय ।
यामें भेद न कीजिये, कहैं कबीर समझाय ॥
कबीर – मास मास ना करि सके, छठे मास अलबत्त ।
यामें ढील न कीजिये, कहैं कबीर अविगत्त ॥
कबीर – छठे मास ना करि सके, बरस दिना करि लेहि ।
कहैं कबीर सो सन्त जन, यमहिं चुनौती देहि ॥
कबीर – बरष बरष नाकरि सके, ताको लागे दोष ।
कहैं कबीर वा जीव सो, कबहुँ न पावे मोक्ष ॥
कबीर – माता पिता सुत स्त्री, बन्धु कुटुम्बको जान ।
गुरु दरशनको जब चले, ये अटकावे आन ॥
कबीर – उनका अटका ना रहे, गुरु दरशनकी जाय ।
कहैं कबीर सो सन्त जन, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥
कबीर – खाली साधु न विदाकर, सुनि लीजे सब कोय ।
कहैं कबीरा भेंट धर, जो तेरे घर होय ॥
कबीर – मुहर रुपया पैसा, कपड़ा बासन देइ ।
कहैं कबीर सो जगतमें, जन्म सुफल करि लेइ ॥
कबीर – निराकार निज रूप है, प्रेम प्रीतिसे सेव ।
जो चाहे आकारको, साधू प्रत्यक्ष देव ॥
कबीर – जा सुखको मुनिवर रमे, सुर नर करें मिलाप ।
सो सुख सहजें पाइये, सन्तों सङ्गति आप ॥
कबीर – कोटि कोटि तीरथ करे, कोटि कोटि करे धाम ।
जब लगि सन्त न सेवई, तब लगि सरे न काम ॥
कबीर – आशा बासा सन्तका, ब्रह्मा लखे न वेद ।
षट् दर्शन खटपट करें, विरला पावे भेद ॥