भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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भारत वर्षसे द्रव्य ले गये और ले जाते हैं । इससे सांसारिक विषय वासना राग भोगमें पड़कर परलोकको एकदम भुला दिया है दिन दिन सांसारिक व्यवहारमें निमग्न होते जाते हैं । भजन भक्तिका अथवा पारलौकिक विचारका स्वप्नमें भी ध्यान नहीं करते । आशा, तृष्णा और सांसारिक कामनाओंमें ऐसे फँसे हुये हैं कि, दिनरात इन्हीं चिन्ताओंमें चक्कर खाया करते हैं कि, किस प्रकारसे धन, दौलत और मान, बड़ाई, प्राप्त हो । योरपवालोंमेंसे कोई भी भजन तपस्या और ईश्वर स्मरणमें लगा हुवा नहीं देख पड़ता । उनका उद्धार होना बहुत कठिन है क्योंकि, मायाके चाहनेवाले जगतसे प्रेम करनेवाले संसारमेंही रहेंगे, उनका कभी बन्धन न छूटेगा । परमात्माकी दीन दुखियोंपर असौम कृपा होती है । हजरत ईसाने कहा है कि, ऊंटका सूईके छिद्रसे निकल जाना सहज है, पर एक धनाभिमानीका मोक्ष पाना कठिन है । महम्मद साहबके समयसे पहले जब पुस्तकावलोकनका बहुत प्रचार हुआ तो उनके समयमें बहुत किताब जलाई गई थी क्यों कि, वह समझते थे किताबोंके बहुत पढ़नेसे भजन भक्ति नष्ट हो जाती है । उसी समय बुत्तपरस्ती जादूगरी, रमल, ज्योतिष, यंत्र, मंत्र आदिका बहुत प्रचार बढ़ गया था, विज्ञानकी भी बहुत चर्चा थी, पर महम्मद साहबने अरबमें उन सब बातोंका खण्डन करके मनुष्योंको रोज़ा निमाज़ सिखलाया भजन बन्दगीमें लगाया ।

बिना पढ़े ज्ञानी — अब मैं उन महात्माओंका वर्णन करता हूँ, जिन्होंने एक अक्षर भी नहीं पढ़ा है केवल एक परमात्माके नामका स्मरण करके दिनरात उसीमें निमग्न हो अपने भजनको पूरा किया है । उनकी सच्ची भक्ति देखकर सद्गुरु कबीर बन्दीछोर मिलता है । जिनको साहब नहीं मिलता वे सिद्धियोंको प्राप्त कर लेते हैं । जिनपर सद्गुरुकी कृपादृष्टि हुई उनका कार्य पूरा हुआ, वे लोग पुस्तकों के कीड़ोंको नहीं चाहते, न उनको उपदेशके योग्य ही समझते हैं । जिस प्रकार कागजके कीड़े कागज कोही खाते और उसीमें रहते हैं उसी प्रकार विद्याभिमानी लोग पुस्तकोंको चाटते रहते हैं बात बात पर वाणी और पुस्तकोंकाही आधार लेते हैं ।

नामके स्मरण करनेवालोंको आवश्यक है कि, पढ़ने लिखनेसे निवृत्त हो जावें । काम पढ़नेपर पुस्तक देखना जरूर चाहिये पर अपना सब समय उसीमें लगा देनेसे भजन नहीं हो सकता । केवल नामकोही दिन रात ध्यान करता रहै क्योंकि, नामके अतिरिक्त जो कुछ हैं वह सब मायिक और तुच्छ हैं, अन्धकारमें डालनेवाला है । यदि नीच घरका भी भोजन करके भजनमें लगा रहे, ईश्वरमें सच्चा प्रेम करे, गुरुमें सच्ची भक्ति रखे तो उसके समान राजा इन्द्र भी नहीं,