भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पेगम्बर आदि यहांही तक पहुँचे हैं। हक्कुल यकीन — और मारफतका पद भी यही है। ज्ञानीके लिये किसी प्रकारका आवर्ण नहीं सब ब्रह्मका प्रकाश है। ज्ञानी को किसी प्रकारकी रक्षावट नहीं जहां देखो वहां वही उपस्थित है। जीव विचारा अज्ञानके कारण बंध रहा है, इसे अज्ञानके अंधेरेमें कोई राह नहीं सूझती। इस अवस्थामें यह एक द्वारसे बाहर हो सकता है, वह द्वार शास्त्र है, शास्त्रके बिना कोई मार्ग नहीं मिलता। शास्त्र माताके दूधके समान है; जिस समय बालक दूध पीता होता है वह केवल अपनी माँके स्तनोंसेही दूध पीना जानता है उसको दूसरी कोई युक्ति नहीं सूझती, जब वही बालक अपनी अवस्थाको पहुँचता है तो स्तनों का कुछ काम नहीं पड़ता, अपने आप अपनी शरीर यात्राका उपाय कर लेता है। इसी प्रकार यह जीव दूधपी वा बच्चेके समान है और ईश्वर युवकके समान। जीव और ईश्वर दोनों आवरण और विशेष शक्तियोंमें बंधे हैं। जीव अल्पज्ञ है, ईश्वर सर्वज्ञ है, विद्या और अविद्यामें दोनों बंधे हैं। यह जीव नाना प्रकारके प्रयत्न और युक्तियोंसे ईश्वर हो जाता है, ईश्वर अपनी भूलसे जीव हो जाता है। इसका कारण ब्रह्म और जीव दोनों एकही बात है, ब्रह्म बिना जीव नहीं, जीव बिना ब्रह्म नहीं। जब ब्रह्मके पदपर स्थित हो जाता है—तो सृष्टिका कर्ता हर्त्ता कहलाता है, इसी पदतक इसकी पहुँच है, यही जीवन मोक्षका पद है। अपने उपायों और युक्तियोंसे ज्ञानानि को उठाता है ज्ञानाग्नि प्रगट होकर कम्मेंके बनको जला देती है। वह आग बहुत प्रबल होता है, जिस प्रकार लाल अंगारा अपनी चमक दमकमें एकही होता है पर अंगारेकी अग्नि शनः शनः ठण्डी होती जाती है, अन्तमें पूर्ण ठण्डी हो जाती है। इसी प्रकार यह जीव ब्रह्मपदको प्राप्त करके भी फिर जीव पदको प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार बारम्बार जीवसे ब्रह्म और ब्रह्मसे जीव हुआ करता है। कभी लाभ और कभी हानि उठाया करता है, इसको कभी सुख नहीं मिलता। ज्ञान प्राप्त होनेपर नाममात्रके लिये जीवन्मुक्त कहते हैं, सर्वदा वन्धनमें रहे उसको जीवन्मुक्त कहनेसे क्या फल? वह तो सर्वदा जीव-नबन्ध है। इस हेतु “तत्त्वमसि” के उक्त तीनों पद भ्रम और धोखा है। क्योंकि उसे स्थिरता नहीं है। कभी होता है कभी जाता है।

जीवन्मुक्त तथा विदेहमुक्त — इस प्रकार जीवन्मुक्त और विदेह मुक्त केवल इस जीवका भ्रम मात्र है। इस जीवन्मुक्तका वृष्टान्त ऐसा समझना चाहिये कि, जैसे एक बन्दरको जङ्गीरमें बाँससे बाँध देते हैं, कभी वह बाँसके ऊपर चढ़ता है, कभी नीचे उतर आता है, इसी प्रकार जीवन्मुक्त अपने कम्मेंके बन्धनमें बाँधा हुआ कभी ब्रह्मपदको प्राप्त होता है, कभी नीचे गिर जाता है। जब यह नीचेसे