कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1119, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंवचन, ३—शान्त बुद्धि, ४—प्रत्यक्ष पारख ५—प्रत्यक्ष सुख ये शीलकी पांच प्रकृतियां हैं ।
विचारकी पांच प्रकृतियां—१—अस्ति नास्तिपदका निर्णय करना, २—यथार्थ ग्रहण करना, ३—व्यवहार शुद्ध रखना, ४—शुद्धभावना रखना ५—सच्चि तता (ज्ञान और विज्ञानकी प्राप्ति) करना ये हैं ।
सत्यकी पांच प्रकृतियां—१—निर्णय, २—निर्बन्ध, ३—प्रकाश, ४—स्थिरता, ५—क्षमा । इन्हीं पांचतत्त्व और तीन गुणों और पचीस प्रकृतियोंकी देह थी । इस शरीरमें यह ेवे परवाह और बन्ध रहित था । ने कोई इच्छा थी न विषयवासनाका बन्धन एव न पशु वृत्तिही थी, बरन इसका बड़ा प्रभाव और प्रकाश था । जब इसने अपने प्रकाशको देखा तो सोचने लगा कि, मेरे समान दूसरा कोई नहीं, मेरा रूप और गुण अनुपम हैं । ऐसा संकल्प होतेही इसको परम आनन्द प्राप्त हुआ, उस आनन्दमें यह अचेत हो गया, अपने आपकी कुछ भी सुधि नहीं रही । इसी अचेता अवस्थाका नाम ब्रह्म सच्चिदानन्द रख लिया । यह महान् सुषुप्तिकी अवस्था थी । जब यह ऐसी सुषुप्तिकी अवस्थामें आ अचेत हुआ तो इसके पक्के तत्व गुण और प्रकृति आदिक सब पलट गये । पक्कीसे कच्ची देह होगई ।
स्थूल देह ।
पाँच कच्चे तत्व तीन गुण और पचीस प्रकृति—धैर्यसे आकाश उत्पन्न हुआ, दयासे वायु निकल पड़ी, शीलसे अग्नि प्रगट हुई, विचारसे जलका प्रादुर्भाव हुआ, सत्यसे पृथिवी बन गई, पक्के तत्वसे बने हुये येही कच्चे तत्व हैं । इनके तीन गुण ये हैं—पृथिवी और जलसे सतो गुण हुआ, अग्नि और वायुसे रजोगुण हुआ, आकाशसे तमोगुण स्थित हुआ । उन्हीं पाँच तत्व और तीनों गुणोंका मेल होकर पचीस प्रकृतियाँ प्रगट हुईं ।
कच्चे तत्वकी पचीस प्रकृतियाँ—१ आकाशकी पाँच प्रकृति १ काम, २ क्रोध, ३ लोभ ४ मोह, और ५ भय ।
२—वायुकी पाँच प्रकृति—१ चलना, २ बोलना, ३ बल करना, ४ सकोचना और पसरणा ।
३—अग्नि तत्वकी प्रकृति—१ आलस्य, निद्रा, ३ भूख ४ तृषा और ५ जम्हुआई ।
४—जलकी पाँच प्रकृति—१ रक्त, २ मूत्र, ३ प्रसेब, ४ लार और ५ बिन्द (बीर्य) ।