भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1122

प्रामाणिकता—यह बचन सत्यगुरु सत्य कबीरका ज्यों का त्यों अनुवाद किया है। जिस किसीको परमात्माने दूरदर्शिता शुद्ध और सूक्ष्म विचार तथा तीव्र बुद्धि प्रदान की हो वही विचारे और समझेगा। जब खूब समझ जायगा तो उसे ज्ञान हो जायगा कि, स्वसम्बेदको और किताबों पर किस प्रकार श्रेष्ठता है? इसमें कौसी सूक्ष्म और अगम्य बातें लिखी हैं, जिससे सारा संसार अचेत है जिसके पथदर्शक था उपदेशक केवल हंस कबीरही हैं।

कथन—कबीर साहब कहते हैं कि, जीव अपने सत्य स्वरूपसे गिरा उसकी दशा बाल, मूक, जड़ और पिशाचके समान हुई। यह पतित होकर इन अवस्थाओंमें पड़ा अपने सत्य स्वरूपको एकदम भूल गया। इस बातकी तनिक भी सुधि न रही कि, मैं पहले क्या था और अब क्या हो गया हूँ।

समस्त संसार और उसके कार्य—जब यह इस प्रकारसे उन्मत्त हुआ एकसे अनेक हो गया, नाना प्रकारके सङ्कल्प विकल्प होने लगे, नानारूप दृश्य आने लगे, जिस प्रकार पागलोंको भ्रम करके नाना प्रकारके स्वरूप दिखाई देते हैं वह उनसे लड़ता झगड़ता और बकबाद किया करता है। एकको सत्य दूसरेको असत्य ठहराता है, एकको छोड़ता है दूसरेको ग्रहण करता है इस प्रकार अनेकोंको ग्रहण करता और छोड़ता है, स्थिर नहीं होता। अपने जाननेमें पागल होशमें अच्छाही करता है। पर सचेत और बुद्धिमान् पुरुषोंके जाननेमें वही पागल होता है। ज्ञान सुषुप्ति और अज्ञान सुषुप्ति दोनों उन्मत्त अवस्थाही हैं, इसी प्रकार तत्त्व-मसिके तीनों पद झूठे हैं, जो कुछ यह कहता और सुनता है सब उसी प्रकार निर्मूल होते हैं कोई ठीक नहीं। यावत् मतमतान्तर हैं सब ऐसेही भ्रमके ऊपर खड़े हैं। जिस अवस्थामें यह संसारही अचेततामें रचा गया है तो उसके कर्म और वाणी बचन सब वैसेही भ्रम और अज्ञान संयुक्त होंगे, उनका माननेवाला बुद्धिमान् विद्वान् अथवा सचेत नहीं समझा जा सकता। इस कारण यह संसार अचेत और अज्ञान है, इसके सारे कार्य अचेतताके ही हैं।

निर्गुण सगुण भ्रम—यह जितना योग, युक्तियाँ, यज्ञ, जप, तप, भजन, भक्ति आदिक करता है सबका यही परिणाम है कि, ब्रह्म सच्चिदानन्दके पदको पहुँच जावे पर हंस देह नहीं पा सकता, इसकी समझमें यह बात नहीं आती इस संसारमें जितने सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर हुये हैं और होंगे किसीमें यह सामर्थ्य नहीं कि, वह यथार्थ पदको बतला सके; सबके सब सगुण निर्गुणमें पड़े हुये हैं, निर्गुण और सगुण सब भ्रम और धोखा है सब इसी निर्गुण और सगुणके बन्धनमें रहा करते हैं, इससे बाहर निकालनेवाला कोई सत्य पथ दर्शक नहीं दीखता।

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश) · पृष्ठ 1122, कुल 1367 में से · BharatKosha