कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1123, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंछाया वासना—यह अपने जानते तो वासनाको त्याग देता है, मनको मार लेता है पर यथार्थमें न तो इसका मन मरता है न वासनाही नष्ट होती है, वासना सर्वदा इसके सङ्ग बनी रहती है । सब ओरसे ज्ञानका सूर्य मध्याह्नको पहुँचता है तो इसकी वासना जो यथार्थमें इसकी छाया है, इसके शरीरमें गुप्त हो जाती है, बाहर नहीं दिखाई देती पर सर्वतः इससे अलग नहीं होती । ज्ञानरूपी सूर्य नीचेको ढलने लगता है तो वासनारूपी छाया फिर प्रगट होने लगती है यह उस छायरूपी स्त्रीसे प्रेम करने लगता है सदैव उसको अपने हृदयमें लगा रखता है, इस कारण वह इससे दूर नहीं होती ।
उसका साथ—यद्यपि यह अपनी तपस्या, भजन भक्ति, और ज्ञानसे पूर्णताको पहुँच जाता है, बहुत ऊँचे पदको प्राप्त करता है तो भी वासना इसको खींच लेती है पूर्वकी अवस्थामें डाल देती है, इसी कारण यह तत्त्वभसिके तीनों पदमें फँस गया है, बाहर निकलनेकी राह नहीं पाता । वासना ही माया है, यही उसकी छाया है यही इसकी प्यारी स्त्री है, यही इसको पकड़ कर नचाया करती है । उसका इससे छूटना कठिन है, इसको पक्के तत्वका घर नहीं मिलता, सदा कच्चे तत्वमें बंधा रहता है ।
कबीरसाहबका शब्द ।
कहु वैकुण्ठ कहाँ रे भाई ।
कितना ऊँचा कितना नीचा केती है चौड़ाई ।
अटकल पञ्चो भरमत डोलें कौन महलको जाही ॥
जिस साहबने किया पसारा ताको चेतत नाहीं ।
करत फिरे सगरी बद फेली चारों गई भुलाई ॥
कोइ कोइ पहुँचे ब्रह्मलोकको धरि माया ले आई ।
आन पड़े यम कालके फन्दे फिरि फिरिगोता खाई ॥
इस प्रकार यह जीव दुःखी और बिकल हुआ इसको कुछ सूझता नहीं कि क्या उपाय करें ?
कर्म उपासना भ्रम है—यह अपनीही भूलसे अपने स्वरूपसे भ्रष्ट हुआ स्वयं चौरासी लाख योनिकी कल्पना की आपही प्रत्येक योनियोंमें मारा मारा फिरता है । समस्त संसारमें आपही व्यापक हो रहा है अपने भूलसे आपको नहीं पहचानता । इसको कितनाही सिखलाया जावे नहीं सीखता, अपने हठको नहीं छोड़ता मन इसको जिधर भटकाता है उधरही ठोकर खाता फिरता है, आपही सब कौतुक कर रहा है, अपनेही कौतुकको आप नहीं जानता । कर्म उपासना,