कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1124, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंयोग और ज्ञान असत्य हैं उसी प्रकार अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष निर्मूल और जल तरङ्गवत् हैं।
गजल ।
भूल मत यार यह शराब सुरआब । पिये हुयेमस्त दिल किया है कबाब ॥
झूठ को सच जान गलतीसे । यह खयालात सारे नकश बर आब ॥
पञ्च हंकार है तमाशए दिल । होते और जाते रहते मिसल हबाब ॥
वार सब रह खबर न पार कहै । कौन जानै सो बरतरीन जनाब ॥
लौलियां ह्विस जो जिस्मानी । कर दिया सारे शहरको खराब ॥
और इन्सान किस हकीकत में । औलिया अम्बिया अल्लाह ए हबाब ॥
अस्ल इसरार जाने आजिज कौन । दिल जो चाहे सो राग रङ्गो रबाब ॥
बटमार—जितने जीवन्मुक्त कहलाये सात ज्ञानभूमिकाके अनुरागी हुये किसीका छुटकारा न हुआ । इस कारण यह है कि, उन लोगोंने मनुष्यके यथार्थ धर्म न जाने धर्मके स्वरूप न पहचाने सबके सब एक दूसरेकी चाल पर चले आते हैं, सत्य बातको कोई स्वीकार नहीं करता । यदि कोई सत्यकी ओर झुके तो दूसरे लोग उसको भटका कर फिर अंधेरेमें डाल देते हैं इसको सत्यकी चाल पर नहीं चलने देते । सचार्ई रूपी मार्गमें अनेक बटमार लुटेरे हैं इस कारण सबही डूब रहे हैं ।
चार प्रकारके आनन्द ।
१ अज्ञानानन्द—जो सांसारिक रागद्वेषमें प्रवृत्त हो परलोक तथा ईश्वरी भयसे अचेत रहे, मदिरापान करता हो, मांस खाता और व्यभिचार तथा विषय-भोगमें फस रहा हो देहको सच जानकर उसीके शृंगारमें लगा हुआ हो, सदा स्वाद और विषय लम्पटताका अभिलाषी रहे ।
२ ज्ञानानन्दका—स्वरूप है कि, स्थूल सूक्ष्म और कारण—जो तीनों देह हैं इनके स्वरूप और तीनों अवस्थाको जानें, पांच तत्वके पञ्जीकरण को जानें, चारों अन्तःकरणका स्वरूप जानें, मायाकी उपाधियोंको त्याग करें, समझें कि, सब मायासे हैं, चेतन ज्ञानके सत्यसारमें आनन्द रहे अपने स्वरूप आत्माको श्रेष्ठ मानता रहे उसीमें अहम्भाव (अर्थात् वह मैं ही हूँ) भावना रख वारम्बार अभ्यास करें ।
३ विज्ञानानन्द—अवस्थामें क्रिया कर्ता और कर्म कुछ शेष नहीं रहता आत्मा स्वयम् प्रकाश विज्ञानानन्दमें मग्न रहता है और यह विज्ञान हंस सबसे श्रेष्ठ माना गया है ।