भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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स्वरूपकी सूक्ष्मताको नहीं जान सकते। तत्वमसिके तीनों पदोंके ऊपर पारखपद है। वही सत्यपद है, उसीसे जीवोंकी मुक्ति होती है। जो कोई पारख पदको प्राप्त कर लेता है वह पारखी कहलाता है। पारखी गुरु सब धर्म और धोखेको नष्ट कर देता है। एक, अनन्त, बाहर, भीतर, पिण्ड, ब्रह्माण्ड सबके भेद कसर खोटको भिन्न २ करके परखा देता है। पारख पदको प्राप्त हुआ पुरुष फिर कभी उससे पतित नहीं होता। तत्वमसिके तीनों पदको इस जीवने मानकर निश्चय कर रखा है इस कारण ये सत्य दीखते हैं, नहीं तो यथार्थमें तीनों पद निर्मूल और भ्रम मात्र हैं क्योंकि जो कुछ इसने अपने मनसे मान लिया निश्चय कर लिया वो सब भ्रम और धोखा है यह मन आशा तृष्णामें फँसाकर भव सागरमें डुबाने-बाला है, इसके उपदेशसे किस प्रकार तर सकता है? इससे तरनेकी आशा रखना मृगतृष्णाके जलसे प्यास बुझानेके समान है। पारख गुरु हंसपद प्राप्त होता है। तत्वमसिके अभिमानी शुद्ध स्वरूपको नहीं पा सकते, सब प्रकारसे अहङ्कारको त्याग करही पारख गुरुसे सत्य स्वरूप प्राप्त होता है।

जन्म मरणकी सात शाखायें।

जीव अपने सत्यस्वरूपसे पतित होकर विरह और प्रेममें फँसकर अपने यथार्थ स्वरूपको विस्मरण कर देता है। फिर इधर उधर दूँढने लगता है कुछ आधार नहीं पाता तो थककर कहने लगता है कि, मेरा ईश्वर निर्गुण निराकार है बेचून बेचरा है। इस प्रकार आदिमें जब जीवोंने नानाप्रकारकी कल्पना और निश्चय करके कुछ प्राप्त नहीं किया तो दुखीके दुखी रहे, शिव ब्रह्मा और सनकादिक ऋषियोंने नाना प्रकारकी वाणी बनाई सब जीवोंको विरह लगाया सब जीवोंको वाणीका विष चढ़ गया। जब उसमें अचेत हुए तब आशा और भय अर्थात् रौचक और भयानकमें नाना प्रकारकी आशा करके फँसे उसीको जन्म मृत्युका बीज कहते हैं। उसी बीजसे सात शाखायें उत्पन्न हुईं।

ॐ श्रीं रं सौं ऐं ह्रीं क्लीं।

अ इ उ ए व ह म

आशा तृष्णासे ये सातबीज उत्पन्न हुये, इन बीजोंमेंसे प्रत्येककी भिन्न २ सात शाखायें हुईं। १ कर्म, २ उपासना, ३ योग, ४ ज्ञान, ५ उत्पत्ति, ६ स्थिति और ७ नाश। इन सातोंमेंसे प्रत्येककी सात शाखायें हुईं, जिनका विस्तार बहुत है पर यहाँ संक्षेपसे लिखता हूँ।

१ कर्मकी सात शाखायें—अ-अर्थात् कर्मकी नाना प्रकारकी रीतियाँ हैं— १ यजन, २ याजन, ३ अध्ययन, ४ अध्यापन, ५ दान, ६ प्रतिग्रह, ७ मैथुन।