भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1132

तेरी शरण हूँ । बाहर निकलकर तेरे भजनके सिवा कुछ न करूँगा । इस प्रकार प्रार्थना कर यह जीव गर्भसे बाहर होता है अपने बचनको भूल जाता है, विषय वासनामें पड़कर मोह भत्सरमें भत्त हो जाता है ।

साखी – कबीर-उर्ध्व कपाले लटकता, वह दिन करले याद ॥
जठरा सेतो राखिया, नाहिं पुरुषकर बाद ॥

मुसद्दस – जिनके डरसे सारे मे हुआ रआशा ॥
एक थिर न रहे खिर गये मानिन्द बताशा ॥
ले मौत पकड़ उनको बटेराको जो बाशा ।
कर बन्दगी बे आज की तब देख तमाशा ॥
अज्ञ सबके इबादत्से किया खुशक जसदको ।
सुरपति भी डरे जिनसे करे दिलमें हसद्को ॥
वह भी न कोई पाया परम पुरुष पद्को ।
सब भूल गये अपने अमल नेक ओ बद्को ॥
सो सारे हक अन्देश किया मस्कने शाशा ।
कर बन्दगी बे आजकी तब देख तमाशा ॥
अलिभो आमिल् कामिल् बडे सरकार कहाये ।
बे पारख पद पर तत्व आनन्द न पाये ॥
माकूल और मन्कूलमें दिन रात गँवाये ।
बे बूझ न सूझे पढ़ गुरु ज्ञान भुलाये ॥
अरबी फारसी तुर्की संस्कृत औ भाषा ।
कर बन्दगी बे आजकी तब देख तमाशा ॥
केते करते दावा बख्शिदये अमाके ।
दादार जमादार जमीनो जमाँके ॥
शक्निन्दए बाज हों कवी पीलदमाके ।
लूँ फेर छूटे तीर जो तकदीर कमाँके ॥
गर बूझ हकीकत तो रती और न माशा ।
कर बन्दगी बे आजकी तब देख तमाशा ॥
बे मुशिदे हकजूर्के बद खोय दवाँ है ।
खुद बीन खुदीसे रहै तारीक रवाँ है ॥
पादोस्त बहर ओस्त इस आजिजका मकाँ है ।