भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 1143, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1143

देखा यह बात प्रसिद्ध होगई कि, राजा जातका भङ्गी है । इस बातके प्रसिद्ध होनेपर राज्यके जितने अहलकार थे सब बहुत लज्जित हुये । विचारने लगे कि हाय ! हमने बड़ा अनर्थ किया कि, भङ्गीके साथ भोजन आदिक संसर्ग किया । प्रायश्चित्तके लिये ब्राह्मणोंके पास गये, ब्राह्मणोंने कहा कि, अपना सब धन सम्पत्ति ब्राह्मणोंको दान कर दो अपने कुटुम्ब सहित अग्निमें जल जाओ इस पापसे छूटोगे, दूसरा कोई भी मार्ग नहीं है । अतः वे सब अपना धन सम्पत्ति ब्राह्मणोंको देकर अग्निमें जल मरे ।

कौल राजाने जब सुना कि, मेरेही कारण सहस्त्रों मनुष्य सपरिवार अग्निमें जलकर मर गये, अब मेरा जीवन व्यर्थ है, मैं भी जलकर मर जाऊँगा यह विचार कर लकड़ियों जमा करके चिता बनाई उसपर बैठके अग्नि लगा दी । थोड़ी देरमें अग्निकी ताप उसे लगी चेत आया अपनेको देखा कि, मैं वही गाध नाम ब्राह्मण हूँ, जो सरयू नदीमें स्नान कर रहा था । उसके कपड़े जैसेके तैसे रखे हुये हैं, स्नान करनेके लिये चार घड़ीसे अधिक समय नहीं बीता पर उसको भङ्गीके घरमें रहते और उसको राज्य करते हुये सौ वर्ष (१००) हो गये थे । नदीमें डुबकी मारतेही उसकी यह दशा हो गई थी ।

यह कौतुक देखने पर भी सन्तोष नहीं हुआ, फिर तपस्या करना आरम्भ किया । दूसरी बार तपस्या आरम्भ करने पर एक ब्राह्मण उसके घर आया । वह नवागत बहुत कृश और निर्बल हो रहा था । गाधने उसकी यह दशा देखकर पूछा, तुम ऐसे क्यों हो रहे हो ? अभ्यागतने कहा कि, मैं कोशर देशका रहनेवाला हूँ, कालके प्रभावसे वहाँ एक चाण्डाल राजा हो गया था, जिसके साथ वहाँके सब लोगोंने भोजनादिक किया, जिसके कारण वे सब अग्निमें जलकर मर गये । अग्निमें जल जानेके भयसे मैं वहाँसे भाग आया । क्योंकि, मेरा भी उन लोगोंके साथ भोजन आदिकका संसर्ग हुआ था । इस भयसे कि, कोई मुझे भी जल जानेको न कहे मैंने देश छोड़ दिया । अब अज्ञात देशोंमें फिरता हूँ जिससे मुझे कोई न पहचान ले । तभीसे बराबर चान्द्रायण व्रत करता हूँ, जिसके कारण शरीर कृश और निर्बल हो गया है ।

यह कहानीको सुनकर गाध ब्राह्मणने अपने मनमें विचारा कि, यह तो मैंने स्वप्नके समान देखा था, यह प्रत्यक्ष कैसे वर्णन करता है ? इस ब्राह्मणकी जबानी तो मेरा स्वप्नके समयका देखा हुआ सब सत्य जान पड़ता है । कुछ विचार कर उस अभ्यागत ब्राह्मणसे पूरा पता ठिकाना पूछ लिया । वह ब्राह्मण तो बिदा हो गया और गाध उस विषयकी सत्यता जाननेके लिये चला ।