कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवने पहचान लिया पाक जात । जिसस हे कायम यह कुल कायवात ॥
अपने कलमरूमें सितम देखकर । अहद देहिन्दः अहदी भेस धर ॥
और किसीका नहीं ऐसा था ताव । कालके हाथोंसे छुडावे अजाब ॥
इस लिये आंग हुए खुद रसूल । जिसकी निगहसे होवे जम और धूल ॥
देखतेही जीव किये सब पुकार । हक् करीमा विराये किर्दगार ॥
लीजिये बचा हमको अब इस आगसे । आये यहां चल बराये भागसे ॥
जब सब जीवोंको जलता तथा तडपता देखकर सत्यगुरु आये और उनका प्राण बचाया तथा ठंढा किया तब समस्त जीव सत्यगुरुकी स्तुति करने लगे—
शेर
किया सब जानपर रहमत जहाँदार । तू पूरूपसत शब्द सतके अमौदार ॥
पडे हम भूल भवसागरसे आकर । न जानाभेद सत्पुरुष निर आकार ॥
कहीं तीरथ कहीं मूरत पुजाया । कहीं खून कत्लका जारी हुआ कार ॥
कहीं खञ्जर कहीं छूरी चलाया । कहीं मुजबह पै छुटीं खून पिचकार ॥
कहीं हनुमानो भैरव भूत पूजा । कहीं शिव लिङ्ग औचण्डीं गर्म बाजार ॥
कहीं गरदन मरोडी झटका पटका । कहीं आति में जलत बलते जाँदार ॥
कहीं है चक्र भैरवका तमाशा । कहीं बकरे पै धूँसोंकी पडीबार ॥
कहीं रोजः कहीं मैं भङ्ग बूजः । कहीं गलकट बरहमन बैठे खूँखार ॥
कहीं मुर्गा है बिस्मिल हाथ कंसाभ । कहीं चीखें सुवर कालीके दरबार ॥
कहीं है ढोल बजता ओ नकारः । कहीं भजनः है मर्दोजन जनाकारा ॥
कहीं अश्वमेध हो अजामेध । कहीं अहरमन बरहमन मर्दुमाजार ॥
कहीं मुल्ला न काजी ले छुरा हाथ । कहीं गरदन कुशोको तेज तलवार ॥
कहीं रहमत कहीं जहमत दिखाया । पडे सब जीव धोखे धंवेके गार ॥
भरमका धर्म आलममें चलाया । कहींनेक औ कहीं है वह व किरदार ॥
हरी हर हर हरी हर कोइ बोले । कोई कहता अहं ब्रह्म सबका सरदार ॥
कहांतक सो बयों कीजे सरापा । निरज्ज खल का नहिंवार औ पार ॥
येह तीनों दव देवी सबक दाता । इन्हीके मर्दोजन फरमान बरदार ॥
फँसे वेद और शरःमें जीव सारे । नहीं महरम दूँठ कोई शब्द सार ॥
दो लोके और वेद सूलीके सतूँ हैं । लटकते उसके ऊपर जीव जम द्वार ॥
कि ज्यों सावनके घासोंसे छिपे राह । पुरुष सतपंथ यों रोकेहैं मक्कार ॥