भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1203

चौथे मूसाई ( यहूदी ) महाशयोंसे विनती है कि, वे जिन दश आज्ञाओं पर विश्वास करते हैं उसीसे अपनी मुक्ति समझते हैं वे क्या है ? किसने दी ? कहाँ से आई ? किसको मिली ? विचार करेंगे तो मालूम होगा कि, दश आज्ञा देनेवाला और लेनेवाला दोनों बन्धनमें हैं, मुक्त कोई नहीं, वरन् मुक्तिकी सुधि भी नहीं जानते । बन्धने दिया बन्धनेही लिया । इन दश आज्ञाओंका वर्णन इसी पुस्तकमें प्रथम लिख आया हूँ उसको देखें उसपर विचार करें कि, इनका यथार्थ आशय क्या है ? जब उपदेशक उपदेशा दोनों बन्धनमें हों तो मुक्ति कैसे हो सकती है ? जो स्वयं मुक्त नहीं, वह दूसरोंकी क्या मुक्ति देगा ? परम त्माने जिनके अन्तःकरणमें प्रकाश दिया है, जिन्हें कुछ ज्ञान है, वे सोचें समझें कि, कौंदीको कौंदी, कौंदसे कैसे मुक्त कर सकता है ? कदापि नहीं ।

जिस प्रकार मैंने उपरोक्त धर्मोंका वर्णन लिखा है, उसी तरह सब धर्मोंका जानना चाहिये । पक्षपात और अँधाधुन्ध धर्मद्वेष तथा आग्रहमें विवेक और विचार कहाँ है ? जिससे कि, भ्रम और असत्यका त्याग और सत्यकी प्राप्ति, हो । समस्त संसारकी धर्मपुस्तक अन्धोंकी लकड़ीके समान हैं, जिनके विवेक विचार और निरपेक्षता रूप नेत्र नहीं हैं, वे ही उसके सहारा ढूँढ़ते फिरते हैं । वे शास्त्रके आशयको समझ नहीं सकते क्योंकि, उनके भीतर अन्धकार भरा है । यदि प्रकाश होता तो शास्त्रोंके सच्चे आशयको समझकर सीधे मार्गपर चलते उलटा मार्ग स्वीकार न करते ।

उदारता और वीरता ।

मैंने जो हकीकतरायका हाल लिखा इसके धर्मज्ञ होनेका कारण यह था कि, बालकपनसेही उदार था । यह नियम की बात है, जो उदार होता है वह शूरवीर भी होता है, जो शूरवीर होता है वही अपना धर्म रख सकता है । जितने प्रतिष्ठित नामी महात्मागण हुये सब उदार और वीर हुये । उदारता और दृढ़ताके बिना कोई भी धार्मिक नहीं हो सकता । कृपण और हतोत्साहको कभी भी श्रेष्ठता नहीं मिल सकती वह सदा अभागही रहता है ।

एक दिन एक यहूदी स्त्री मूसाकी प्रशंसा ( मुहम्मद साहबके समक्ष ) बड़े उत्साहसे करने लगी कि, मूसा बड़ा उदार पुरुष था । उसके तुल्य कोई नहीं हुआ । यह बात सुनकर मुहम्मद साहेबने कहा कि, मुझसे मांग तू क्या माँगना चाहती है ? उसने कहा कि, आप अपना जामा उतारकर मुझे दे दीजिये । मुहम्मद साहबने अपना जामा उतार कर दे दिया स्वयं नङ्गे हो गये गुफाके अन्दर