भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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गजल ।

हुआ मगूरूर क्योंकर आन दिन चार । रहेगा तेरा शौकते शान दिन चार ॥
हुआ अन्धा ब मस्ती ऐश बइशरत । कमालो फ़ज़ल और बूहरहान दिनचार ॥
अकेला आया है जावै अकेला । मेरा और तेरा है घमसान दिनचार ॥
नहीं कोई रह फ़ना होवे गे लारेब । किसीका तो पकड़ दामान दिनचार ॥
पकड़ दामन तू साचे सद्गुरु आजिज । यह बे बीना न दस्तरखवान दिनचार ॥

गजल—जो कुछ कि, नजर आता है तेरे कुछ न रहेगा ।

महासूस ब मरगूब सगर धार बहैगा ॥

ताजो तख्त ब बख्त सो सब काल चक्करमें ।

फानी है ब मुरदार सभी कुछ चुछैगा ॥

भक्ति ब गरीबी है यही न्यामते दुनिया ।

सद्गुरुकी पनह आ नहिं तो काल आग डहैगा ॥

चौरासीकी योनिमें पडा बैठ ऊपर हो ।

यम जालिमकी इसमें बड़ी मार सहैगा ॥

आजिज होवें जो आजिज इस बहरके गरदाब ॥

बिन सद्गुरुके कौन तेरी बाँह गहैगा ॥

गजल ।

न सद्गुरु भक्ति जाना तूने अ सोस । न उसकी बात माना तूने अफ़सोस ॥

बहर जानिब वह कहता है ब आवाज़ । न अपना कान तानातूने अफ़सोस ॥

वह हर जानिब वह हर रूखसे पुकारें । न जाना मिहर बानातूने अ सोस ॥

भटक रह रास्तेसे फिरता किधरको । अमल बद मार खाना तूने अ सोस ॥

चला तू चाल है सद्गुरुके बर अक्स । किया सब कारखाना तूने अफ़सोस ॥

जो कहते २ ही आजिज थका वह । किया इस घर न थाना तूने अफ़सोस ॥

मुखम्मस तर्जिया बन्द ।

गुरुको भूलै खुदा तूझे भूले । जाके यमराज दर ऊपर झूलै ॥

गो कहूर बान तू कहूरबान वह । हा हो गये जाके आगमें पोखे ॥

गुरु मिहरबान तो मिहरबान वह । पाते न्यामत हैं लंगडे और लूले ॥

गुरुके वे मेहर दौलते ईमों गुरु । कत्ल करेको हाथियोँ होले ॥

गुरुकी पूजा बिना धर्म ईमान ॥

हो गया मुरदा इसमें शक मत जान ॥