भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1228

न यह घर है तेरा घरकी न तू है । तो फिर घर किसलिये भरती है चिउँटी ॥
जब यक दिन आनकर तुझको लताडें । न तू उस रोजको डरती है चिउँटी ॥
सिखाया तूने यक दिन शह सुलेमों । आजिज बात रख रखती है चिउँटी ॥

गजल (साथ)

जर सीमसेकी जो प्यार ऐ सोंप । है तेरा वह घर वह बार ऐ सोंप ॥
आकरके खजाना पर तू बैठा । यह तेरा था दिल फ़िगार ऐ सोंप ॥

जिस दिलवरसे दिल लगाये । उस जामे तेरा क्रार ऐ सोंप ॥

जर सीम जहाविरात महबूब । उनसेही तेरा था प्यार ऐ सोंप ॥

माशूकके घर तुझे बैठाला । मिल शौकसे अपना यार ऐ सोंप ॥

कर दूर दफ़ीनः से आजिज । पावेगा तू हक्क दीदार ऐ सोंप ॥

गजल—जगतके आदमी हैं डोंगर ढोर । धरम धरधरके मारे डोंगर ढोर ॥

शमअ परवानः आदमोन कोई । हिर्स हैवान प्यारे डोंगर ढोर ॥

काल काबूमें कोई नहीं इन्साँ । मंरते खपते बिचारे डोंगर ढोर ॥

है बरी आदमी सब दुख द्रन्द । हाय तोबः पुकारे डोंगर ढोर ॥

पहन इन्सान लवास आजिज । जान घरको हमारे डोंगर ढोर ॥

तरजिय बन्द खमसः ।

यह कुल मखलूक आतशमें जले हैं । जो मरहम हाथ हसरतसे मले हैं ॥

गुनः करनेमें हरगिज नहीं टले हैं । जो रोराँ संगपर उनको तले हैं ॥

क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ॥

हरीसे दुनियवी हों ग़र्क दुनिया । गुरु और साधु जो बातें न सुनिया ॥

जो बोया तूने सोई तुझको लुभिया । न दुनिया आक़बत यमजीऊ छले हैं ॥ क०

जो सीखे होशियारी कुछ जहाँकी । कहाँ जाना था सोली रह कहाँ की ॥

न जाना भेद इसरारे निहाँकी । सो हराराते जमीं मआदिन रले हैं ॥ क०

लगे इस बाग़ सद्दा बेल व बूटे । दरखतां वे अदद हर जाय फूटे ॥

जो हो फ़लदार सो मालीसे टूटे । सो काटे जायेंगे जो न फले हैं ॥ क० ॥

सदाजो साधुगुरुको सर झुकाये । भजन सुमिरनसे अपना दिल लगाये ॥

दया दान और धरमकी राहबनाये । गुरु और संत फरमांसमे चले हैं । क० ।

हुये जो खाके मोटे मस्त मग़रूर । हमेशः साधु गुरुसे सो रहे दूर ॥

ज़र्क और बर्क पोशिश ताज सुमबूर । सोहों बलिदान मोटे ो पले हैं ॥ क० ॥

नहीं दिलमें जिनके रब्ब रहमान । न उनपर होवे हरगिज रहम सुवहान ॥

सोई आजिज पड़े चौरासीकी खान । न पावें राह सो मर मर गले हैं ॥

क़लम बाहेसे हलवाहे भले हैं ।