कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1247, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुछ विशेषता नहीं हुई । विद्वानभी मूर्खोंके समान वेही कर्म करते हैं उनके पुस्तकालय कोई काम नहीं आते । यह मनुष्यकी दूसरी अवस्था है, जब कि, दूसरीही अवस्था में विद्या और कला कौशल तुच्छ हो गये जब उनकी कुल विद्या कला कौशल केवल जाग्रतके लियेही हो तो जाग्रतकी अतिरिक्त अवस्थाओंके लिये कौनसी विद्या और बुद्धिमानी आवश्यक है, उनमें तो जाग्रतकी कोई सामग्री नहीं होती । सुषुप्तिसे आगे तुरीयातीत अवस्थाओंमें कौन पुस्तक वेद किताब और मार्ग बतलाती है । इन बातोंका भेद विद्याभिमानी बिचारे क्या जाने, उनको इस बातकी सुधिभी नहीं हो सकती । स्वयं सत्य विचार और अभ्यास भक्ति तो हो ही नहीं सकती, वे सन्त सेवा जानतेही नहीं बरन् सन्तोंसे ईर्षा करते हैं कि, देखो हम लोग इतना परिश्रम करके दिनरात उसीमें लगे रहनेपर अपनी रोटी प्राप्त करते हैं पर फकीर बिना परिश्रम केही हूष्ट पुष्ट बने रहते हैं, ऐसे विचार करनेवाले बिलकुल अन्धे और बुद्धिहीन हैं । उनमें तनिक भी विचार नहीं कि, जीवधारियोंको कौन भोजन देता है ? उन्हें कौन वस्त्र पहनाता है ? कितने जीवधारी पशु पक्षी ऐसे वस्त्र पहनते हैं कि, मनुष्योंको स्वप्नमेंभी नहीं प्राप्त हो सकते । भलाजी, जो पापियोंका पोषण करता है वह अपने मुख्य शिष्योंको किस प्रकार भूल सकता है ? विद्याभिमानी लोगोंका इन बातोंके ऊपर ध्यान न देनेसे उनकी बुद्धि अन्धकारमय होगयी ।
ज्ञानकी सात भूमिका हैं, उनमें केवल तीन भूमिकातक वेद और किताब हैं, शेषकी भूमिकाओंमें वेद और किताबोंकी आवश्यकता नहीं इसी कारण सन्तोंके अतिरिक्त शेष भूमिकाकी बातें विद्याभिमानी नहीं जान सकते । उन अवस्थाओंका भेद सत्यगुरुकी भक्ति और सेवाकर कृपापात्र बननेसे प्राप्त हो सकता है । यदि पुस्तकोंसेही ये बातें प्राप्त होती तो संसारके बड़े २ विद्वान, राजे, महाराजे फकीर क्यों बन जाते ? विद्याभिमानियोंकी बुद्धि और विवेक सीमाबद्ध है । सच्चे सन्त ज्ञान और विवेकके भण्डार हैं उनकी बुद्धि अपार है यदि पुस्तकोंकेही पढ़नेसे ईश्वरीय भेदकी बातें जानी जाती तो सन्तोंके उपदेशकी आवश्यकताही न होती । इस कारण मनुष्यको उचित है कि, पारलौकिक ज्ञान की प्राप्तिके लिये सच्चे सन्तोंकी शरणकोही ग्रहण करें, सांसारिक विषयमें विद्वानोंकी आवश्यकता है ।
नवकोश और पांच अहङ्कारोंका भी वर्णन कर आया है कि, इस जीवने नौकोशोंमें अपना घर बनाया, पुस्तकादि कला, कौशल सब प्रथम कोशके सम्बन्धी हैं । सब अवस्थाओं और कोशोंकी सुधि, सच्चे विचारवान् ज्ञानी