भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1298

छोड़ हरगिज नता दम सुकराद । तुफ्फ तुझ पर ऐ शहवात वह जात ॥
मायाने मार सबको काम छुरा । करदिया पहले काल हाल बुरा ॥
रही ब्रह्माको भी न शर्म जरा । विष्णु तन, घरके बघरको फिरा ॥
शिव ऊपर लाई मोहिनी आकात । तुफ्फ तुझ पर ऐ शहवात बद जात ॥
शृंगी ऋषिसे बुजुरगें शाहिदथे । जो उवादतमें अहद वाहिद थे ॥
हवस नफ़सानीके न शाहिदथे । गैवके मूजिदव मनाहिद थे ॥
उनके सर परभी धर दिया तू लात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बद जात ॥
भडकी शहवतकी आग जब अन्दर । इन्दर विल्ली हुये नारद वन्दर ॥
सग बनाया तुही विश्वामितर । चन्द्रमाँ मूर्ग कोई हरिण तीतर ॥
आरिफोंको दिया तू यह दरजात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
जाहिदोआविदो धर्म मूरत । दिल मनौवर हो देख जो सूरत ॥
कौड़ीकां कर दिया है यह औरत । अन्ध गलताँ हो गलवये शहवत ॥
रह बदकारीकी बताया घात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
रहते जो खुशक बर्गको खाकर । निकली उस-तनसे शहवत अखगर ॥
रोज रोशनको कर दिया था रात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
लंक रावणका कर दिया बरबाद । महाभारत भी द्रौपदी फिरियाद ॥
जंग तिरौचन भये उसे कीजे याद । मर गये बेशुमार हो नाशाद ॥
जिनकी कोई कभी न पूछे बात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥
बाद शाहतको तू मिला दे गर्द । गाज़ी और पहलवान करे दिल सर्द ॥
आजिज इस सा न कोई बेदर्द । ओलिया अम्बिया करे बेपर्द ॥
यह बड़ा एक खवीस है हैहात । तुफ्फ तुझ पै ऐ शहवते बदजात ॥

प्रारब्ध और पुरुषार्थ ।

६५ प्रश्न—शूर वीरतासे प्रारब्ध मिट जाता है ?

उत्तर—उदारता, दीनता, न्याय और शील ये चारों पुण्यके मूल हैं । जो कोई इनको भलीप्रकार धारण करेगा, जिसमें ये चारों गुण अखण्ड रहेंगे, वह प्रारब्धको भी मिटा सकता है । ये गुण जिसमें होते हैं उसको ईश्वरी सहायता मिलती है । पर कोई २ प्रारब्धही ऐसी होती है जिसको भोगे बिना छुटकारा नहीं होता ।

योग वासिष्ठकी कथा—एक समय भृगुमुनि अखण्ड ध्यानमें निमग्न हो तपस्या कर रहे थे । उनके पुत्र शुक्रजी सेवा करते हुए योग्यतानुसार भजन भी किया करते थे । एक समय एक अप्सरा उधरसे आ निकली । शुक्रको देख-