कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1299, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर मोहित होगई । शुक्र बड़े सुन्दर और कान्तिमान् थे । शुक्रकी दृष्टि भी उस अप्सरापर पड़ी । यह भी उसपर मोहित होगये । वह स्वर्गको चली गई । इधर उसीकी चिन्तामें शुक्रजीका शरीर छूट गया । अब दिव्य शरीर पाकर शुक्र स्वर्ग लोक पहुँचे राजा इन्द्रने शुक्रको आते देखकर सिंहासनसे उठ बहुत आदर मानसे बैठकर कहा कि, आपने बड़ा अनुग्रह किया, आप कुछ काल तक यहीं निवास कीजिये । शुक्र वहीं रहने लगे । एक दिन नन्दनवनमें भ्रमण करते २ वही अप्सरा दृष्टि पड़ी अप्सराने भी उन्हें देखा । अब क्या था दोनों ओरसे प्रेमसे ऐसी उमङ्ग मारी कि, दोनों एक क्षणभी अलग न रह सकें । लज्जावश हो शुक्रजीने तपोबलसे कुहेरा उत्पन्न किया चारों दिशामें अंधेरा छागया शुक्र और अप्सरा दोनोंने कामविलास करना आरम्भ किया, स्वर्गीय आयु क्षीण होनेपर दोनोंने स्वर्गसे गिरकर पृथ्वीपर जन्म धारण किया । शुक्रने तो एक ब्राह्मणके घर और अप्सराने एक राजाके घर जन्म लिया । समय पाकर राजकन्याने पूर्वके पतिके लिये शिवका आराधन आरम्भ किया । कुछ काल बीते पीछे राजकुमारीका स्वयंवर रचा गया। अनेक देशोंके राजकुमार आये उसके साथ २ ब्राह्मण भी अपने पुत्रसहित वहाँ आया । राजकुमारीने ब्राह्मण कुमारको माला पहिनायी । वो राजमहलमेंही रहने लगा । राजाको इस पुत्रीके सिवा दूसरी संतान न होनेके कारण वही ब्राह्मणकुमार राज्याधिकारी हो, बहुत कालतक राज्यकर मृत्युको प्राप्त हो, क्रमशः मछुआ और हिरण हो अंतमें फिर एक ब्राह्मणके घरमें जन्मा । अबकी बार पहिले पुण्यके प्रतापसे उसे संसारसे वैराग्य हुआ सबसे विरक्त हो गंगातटपर बैठे ध्यानमें निमग्न हुआ । इधर समय पाकर जब भृगुमुनिका ध्यान खुला तबतक शुक्रके पाँच जन्म हो चुके थे,
आंख खोलकर पुत्रका चारों ओर अन्वेषण करनेपर पुत्रको नहीं पाया वरन् उसकी सूखी हुयी मृतक देह मिली । यह देखतेही कालपुरुष पर अत्यन्त क्रोधित हो भृगुजीने कालपुरुषको शाप देना चाहा तो वो उनके सम्मुख आकर कहने लगा ।
उस समय कालपुरुषकी मूर्ति महाभयानक दीख पड़ती थी उसकी तीनों आंखें तीन सूर्योंके समान प्रकाशित और प्रदीप्त हो रहीं थीं । हाथमें त्रिशूल लिये हुये था । त्रिशूलमेंसे आगकी ज्वालाएँ निकलती थीं कालपुरुषने कहा कि तुम्हारे भस्म करनेसे मैं भस्मभी नहीं हो सकता । जो जैसा कर्म करता है मैं उसको वैसाही फल देता हूँ । तुम्हारे पुत्रने स्वयम् अपने कर्मानुसार फल पाया है । इतना कहकर कालपुरुषने शुक्रका सब हाल कह सुनाया ।