कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1308, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकठिन बन गई है, गोल पानीपर जमकर गोल दीख पड़ती है। यदि पृथ्वीको पानीसे अलग किया जावे तो गोल न दीखेगी। हाँ पानीके साथ तो गोल होनेमें कुछ सन्देहही नहीं।
(३) हिन्दू कहते हैं कि, पृथ्वी कमलके पत्तेके आकार है वो बात भी ठीक है क्योंकि, पृथ्वी जलके ऊपर जमाई गई तो गोल जमाई गई जो कुछ गोल पदार्थ पानीपर जमाया जाता है उसके नीचे गावडुमी स्थान शून्य रहता है इसी कारणसे पृथ्वीको कमलके पत्तेके आकारका कहा है।
(४) पृथ्वी चौकोर है यह भी कहना ठीक है क्योंकि, स्वरौदय आदिमें पृथ्वीतत्त्वको चतुर्कोणही बताया है, जो तत्त्वदर्शी होते हैं, स्वरोंको साधकर तत्त्वोंके आकारोंको देखते हैं चारों तत्त्वोंके रङ्ग, ढङ्ग, चाल और उसके सबगुण दोषोंको जानते हैं वे पृथ्वीको चतुर्कोणही देखते हैं। स्वोंसके साथ चारों तत्त्व का रूप प्रत्यक्ष देख पड़ता है। आकाश तत्त्व स्वरके अन्तरमें रहता है बाहर दिखाई नहीं देता। इससे भी पृथ्वीको चौकोर कहा गया है।
पृथ्वी चौकोर, जल गोल, अग्नि त्रिकोन, वायु और आकाश भी गोल है।
(५) पृथ्वीको चिपटी कहनेकाभी वही पानीपर जमाया जाना कारण है क्योंकि, कोई गाढ़ा तरल पदार्थ गोल पदार्थपर जमाया जाय तो वह चिपटे आकारमेंही जमेगा। भारतीय विद्वानों तथा पुराणोंका कथन बहुत ठीक और सत्य है पर उसके समझनेके लिये बुद्धिकी आवश्यकता है। भारतीय विद्वानों और महात्माओंके कथनमें असत्यका गन्ध भी नहीं हो सकता क्योंकि, वे प्रकाशित हृदय और पूर्ण ज्ञानवान तथा त्रिकालदर्शी अंतर्धर्मी हुये हैं।
हिन्दू लोग कहते हैं कि, पृथ्वी अचल है चल नहीं इसका कारण यह है कि, पृथ्वीको कोशोंमें, धरा, स्थिरा, अचला और धरणी आदि नामसे लिखा है, जिनसे स्पष्ट सिद्ध होता है कि, पृथ्वी अचल है। यदि पृथ्वी गतिवाली होती तो उसे धरणी आदि नामसे क्यों कहते? बरन् अचलाके स्थानमें चला कहते।
इसीपर मुसलमानी धर्मके विद्वान्— 'पृथ्वीको स्थितही बतलाते हैं जैसा हजरत शेख सादी सिराजी लिखते हैं कि—
जमीं अज तप लरजः आमद सतोह ।
फरोकोपत बर दामनश मेख कोह ॥
इसका भावार्थ यह है कि, सृष्टिके आदिमें परमात्माने पृथ्वीको बनाया उस समय यह कांपती हुई डगमगाती थी, पीछे पहाड़ोंका खूँटा ठोककर स्थिर कर दिया गया है।