भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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दर्शन पाता है। गुरुकी शिक्षासे उसके नामको जप। वह पुरुष कँसा है “आदि सच युगादि सच, है भी सच और होगा भी सच”।

नानक साहबका सब कथन कबीर साहबसे मिलता हुआ है कुछ भी भेद नहीं है देखो ग्रन्थ साहब श्लोक महला पहला नानक शाह वचन —

पढ पुस्तक संध्या वादंग । शिल पूजस बकुल समाधंग ॥
मुख झूठ भयो खन सारंग । तरे पाल ते हाल विचारंग ॥
गल माला तिलक लिला टंग । दोय धोती वस्तर कपाटंग ॥
जो जानन ब्रह्मंग कर मंग । सब निश्चे फोकट धरमंग ॥
कह नानक निश्चयं ध्यावे । बिन सतगुरु बाट न पावे ॥

आसा महल्ला पहला आदिकी साखी ।

बलिहारी गुरु आपने, घड़ी घड़ी सौ सौ बार ।
मानुषसे देवता किया, करत न लागी बार ॥
जो सौ चन्द्रा उंगवै, सूरज कोटि हजार ।
ऐसे चादन होत हो, गुरु विन घोर अँधार ॥

नानक साहबने ग्रन्थमें पहले अपने गुरुकी साखी रखकर फिर अपनी वाणी रखी है। आजकल नानक पंथके लोग कबीर गुरुको केवल एक भक्त मानते हैं। इसी कारण यथार्थ आशयको न समझकर बहुत बातें बनाते हैं।

सब लोग वाहगुरु बोलते हैं पर कोई नहीं समझता कि, वाहगुरु कौन है? कबसे है? किस वास्ते है? सिक्ख लोग इस वाहगुरुके विषयमें अपनी बुद्धिसे इस प्रकार अर्थ लगाते हैं कि, व से वासुदेव। ह से हरि। ग से गोविन्द। र से राम। इन्हीं चारों अक्षरोंसे वाहगुरु बना है। सो यह परमेश्वरका नाम है।

वे यथार्थसे एकदम अनभिज्ञ हैं यथार्थ तो यों है कि, जब नानक साहबको सत गुरु मिले तो उन्होंने सत गुरुकी स्तुति की।

नानक साहब ।

शब्द— वाह वाह कबीरके गुरु पूरा है, वाह वाह कबीर गुरु पूरा है।
पूरे गुरुके मैं बलि जैहों, जाका सकल जहूरा है ॥
अधर दुलीचा परे हैं गुरुनके, शिव ब्रह्मा जहाँ झूला है ॥
स्वेत ध्वजा फहरात गुरुनके, बाजत अनहद तूरा है ॥
पूरन कबीर सकल घट दरसे, हरदम हाल हजूरा है ।
नाम कबीर जपें बड़ भागी, नानक चरणके धूरा है ॥