कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1339, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंदीक्षाकालके कर्तव्य ।
९६ प्रश्न—गुरु करने और दीक्षा लेनेके समय क्या क्या करना आवश्यक है ?
उत्तर—जो रीति और व्यवहार गुरु बतलावे वह करे । गुरुको प्रतिष्ठाके साथ वस्त्र आदि पहनवावे । उच्च आसनपर बैठकर, रुपया आदि सब यथाशक्ति भेट धरे । साधुओंको भण्डार दे जहाँतक अपनेसे होसके साधुओंको भेटादि देकर प्रसन्न करे । जिसने अपना सर्वस्व तन मन धन गुरुके अर्पण किया उसकासर्व कार्य सिद्धि हुआ । अपने गुरुका आज्ञाकारी रहना गुरुको गोविन्दसे बढ़कर मानना शिष्य का मुख्य कर्तव्य है ।
गुरु अंगकी साखी ।
कबीर—गुरुको कीजे दण्डवत, कोटि कोटि परणाम ।
कीट न जानें भूङ्गीको, गुरु करले आप समान ॥ १ ॥
कबीर—गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काको लागों पाय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दिया बताय ॥ २ ॥
कबीर—बलिहारी गुरु आपने, घड़ि घड़ि सौ सौ बार ।
मानुषसे देवता किया, करत न लागी त्रार ॥ ३ ॥
कबीर—ते नर अंध हैं, गुरुको कहते और ।
हरि रुठेतें ठौर है, गुरु रुठे नहिं ठौर ॥ ४ ॥
कबीर—गुरु हैं बड़े गोविंदते, मनमें देखु विचार ।
हरि सुमिरे सो बार है, गुरु सुमिरे सो पार ॥ ५ ॥
कबीर—गुरुसे ज्ञान जो लीजिये, शीस दीजिये दान ।
केतिक भोंदू पछि मुये, राखि जीव अभिमान ॥ ६ ॥
कबीर—गुरु मुख गुरु आज्ञा सुने, छोड़ि देइ सब काम ।
कहैं कबीर गुरु देवको, तुरत करे परनाम ॥ ७ ॥
कबीर—उलटे सुलटे वचनको, शिष्य न मानै दुख ।
कहैं कबीर संसारमें, सो कहिये गुरु मुख ॥ ८ ॥
कबीर—गुरु और पारसमें, बडो अंतरो जान ।
वह लोहा कंचन करे, वह करे आप समान ॥ ९ ॥
कबीर—राम नामके पटतरे, देवेको कछु नाहिं ।
क्या ले गुरु संतोषिये, हवस रही मन माहिं ॥ १० ॥
कबीर—निज मन तो नीचा किया, चरण कमलके ठौर ।
कहैं कबीर गुरु देव बिन, नजर न आवै और ॥ ११ ॥