कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1350, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर- प्रेम बिना धीरज नहीं, विरह बिना वैराग ।
सतगुरु बिना मिटै नहीं, मन मनसाका दाग ॥
कबीर- जहाँ प्रेम तहाँ नेम नहीं, तहाँ न बुद्धि व्यवहार ।
प्रेम मगन जब मन भया, कौन गिने तिथि वार ॥
कबीर- प्रेम छिपाया ना छिपे, जा घट परगट होय ।
जौ पै मुख बोलै नहीं, नयन देत हैं रोय ॥
कबीर- प्रेम भाव एक चाहिये, भेष अनेक बनाय ।
भावे घरमें वासकर, भावे वनमें जाय ॥
कबीर- योगी जंगम सेवडा, संन्यासी दरवेश ।
बिना प्रेम पहुँचे नहीं, दुर्लभ सतगुरु देश ॥
कबीर- पीया चाहे प्रेमरस, राखा चाहे मान ।
एक म्यानमें दो खड़, देखा सुना न कान ॥
कबीर- पियारस पिया सो जो जाने, उतरे नहीं खुमार ।
राम अमल माता रहे, पिये अमी रस सार ॥
कबीर- प्याला है प्रेमका, अन्तर लिया लगाय ।
रोम रोममें रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥
कबीर- ऐसी भट्टी प्रेमकी, बहुतक बैठे आय ।
शिर सौपे सो पीवसी, नातर पिया न जाय ॥
कबीर- जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं ॥
कबीर- जबलग जो मरनेमें डरे, तबलग प्रेमी नाहिं ।
बड़ी दूर है प्रेमघर, समझ लेउ मन माहिं ॥
कबीर- जैसा लौ पहले लगे, तैसे निबहे ओर ।
अपनी देहको को गिने, तारे पुरुष करोर ॥
कबीर- लागी लागी क्या करे, लागी नाहीं एक ।
लागी सोई जानिये, करे कलेजे छेक ॥
कबीर- लागी लागी क्या करे, लागी सोइ सराह ।
लागी सोई जानिये, जो उठि कराहि कराहि ॥
कबीर- लगन लगी छूटे नहीं जीभ चोंच जरि जाय ।
मीठो कहाँ अंगार है, गहे चकोर चबाय ॥
कबीर- जा खोजत मुनिवर थके, सुरनर मुनिवर देव ।
कहैं कबीर सुन साधुआ, कर सत गुरुको सेव ॥