भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर- प्रेम बिना धीरज नहीं, विरह बिना वैराग ।
सतगुरु बिना मिटै नहीं, मन मनसाका दाग ॥

कबीर- जहाँ प्रेम तहाँ नेम नहीं, तहाँ न बुद्धि व्यवहार ।
प्रेम मगन जब मन भया, कौन गिने तिथि वार ॥

कबीर- प्रेम छिपाया ना छिपे, जा घट परगट होय ।
जौ पै मुख बोलै नहीं, नयन देत हैं रोय ॥

कबीर- प्रेम भाव एक चाहिये, भेष अनेक बनाय ।
भावे घरमें वासकर, भावे वनमें जाय ॥

कबीर- योगी जंगम सेवडा, संन्यासी दरवेश ।
बिना प्रेम पहुँचे नहीं, दुर्लभ सतगुरु देश ॥

कबीर- पीया चाहे प्रेमरस, राखा चाहे मान ।
एक म्यानमें दो खड़, देखा सुना न कान ॥

कबीर- पियारस पिया सो जो जाने, उतरे नहीं खुमार ।
राम अमल माता रहे, पिये अमी रस सार ॥

कबीर- प्याला है प्रेमका, अन्तर लिया लगाय ।
रोम रोममें रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥

कबीर- ऐसी भट्टी प्रेमकी, बहुतक बैठे आय ।
शिर सौपे सो पीवसी, नातर पिया न जाय ॥

कबीर- जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं ॥

कबीर- जबलग जो मरनेमें डरे, तबलग प्रेमी नाहिं ।
बड़ी दूर है प्रेमघर, समझ लेउ मन माहिं ॥

कबीर- जैसा लौ पहले लगे, तैसे निबहे ओर ।
अपनी देहको को गिने, तारे पुरुष करोर ॥

कबीर- लागी लागी क्या करे, लागी नाहीं एक ।
लागी सोई जानिये, करे कलेजे छेक ॥

कबीर- लागी लागी क्या करे, लागी सोइ सराह ।
लागी सोई जानिये, जो उठि कराहि कराहि ॥

कबीर- लगन लगी छूटे नहीं जीभ चोंच जरि जाय ।
मीठो कहाँ अंगार है, गहे चकोर चबाय ॥

कबीर- जा खोजत मुनिवर थके, सुरनर मुनिवर देव ।
कहैं कबीर सुन साधुआ, कर सत गुरुको सेव ॥