कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1351, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनजम ।
सुनो यारो मुहब्बतकी कहानी । भरे नेमत दो आलम जिसका पानी ॥
किया शहे इश्कने जिस दिलमें डेरा । वहाँ बाकी रहा तेरा न मेरा ॥
जो दिलवर आनकर जादूको डारा । हुआ तब इश्कसे दिल पारः पारा ॥
जो आकिल या फलाई जमाना । हुआ सब अकल खोकरके दीवाना ॥
शहनशह था सब जमीं और जँका । बना कमतर सो खादिम खादमाँका ॥
हुई जब यारसे अपने जुदाई । गई तब बन्दगी भूली खुदाई ॥
कहाँ तब जुहद है तकवा तिहारत । मुहब्बत यारकी निशि दिन महारत ॥
निछावर कर दिया तन मन धन अपना । सो सब संसारको देखे जो सपना ॥
विरहका तीर दिल छिदकर हुआ पार । बेगाने खे़श आँखोंमें लगे खार ॥
जुदाई यारनेकी जब दिवाना । व्यावौ दशत सेहरा खाक छाना ॥
हैं निसदिन करते फिरत प्रियजारी । सद आह बनालः और अशकबारी ॥
किया दिलवरके कूचा जबसे फेरा । हुआ आँखोंमें कुल आलम अँधेरा ॥
मुहब्बत यारकी दिलमें जो जागी । अकल उस वक्तसे रुखसतको मांगी ॥
अकल कुत्तीको दुरदुर कर दिया है । नहीं तू है जहाँ मेरा पिया है ॥
उठाते गीत गाते अर्गनूसे । मुहब्बत यारमें फिरते जनूसे ॥
अरे हुदहुद मँरे पीतमकी पाती । तू ला पढ़कर जुड़ाऊँ अपनी छाती ॥
कि निसदिन यादमें है ज्ञान उबाली । हुआ सारे हवससे दिल जो खाली ॥
किया खाली जो खानः दिल सहलमें । बैठे दिलदारको तब उस महलमें ॥
नहीं कुछ काम है दुनियाँ व दीसे । तो दम मारना क्या आँ व ईसे ॥
कि जिस घरमें मेरा माशूक आवे । वहाँ कोई दूसरा रहने न पावे ॥
नहीं दुनियाकी कोई मुश्क व बू है । तू देखे दिलके अन्दर तुही तू है ॥
जो सारी मक्खियाँ दिलसे निकाला । तो उस घरबीचमें दिलवर बिठाला ॥
तु हो आनन्द कर दर बन्द नयना । दिल अन्दर दिलरोवासे बोल बैना ॥
सतगुरुकी प्रशंसा ।
मुसद्दस ।
मालम हुआ वेद व कुरआँकी रकमसे ।
जाहिर है तेरी हमद वं सना अहले कलमसे ॥
क्या किलक लिखे हीमः गो वागो अरमसे ।
दुनियामें न कोई वाकिफ है वस्ले सनमसे ॥
जो कुछ नजर आता है सो तेरेही करमसे ।
सब इल्मो अमल बरकत सतगुरुके कदमसे ॥