भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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खँमसरी ग्वालिन थी उसको उसके समस्त साथियोंसहित चालीस मनुष्योंको लोकको ले गये ।

यहाँ श्रीमुनीन्द्रजीके सतयुगमें पृथ्वीपर आकर जीवोंको उपदेश देनेका प्रमाण देदिया जाता है—

प्रमाण अनुराग सागरका ।

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

जब हम देखा धर्म सकाना । तब तहँवाते कीन्ह पायाना ॥
कह कबीर सुनु धर्मनि नागर । तब मैं चलि आयऊँ भौसागर ॥

ज्ञानीजीका ब्रह्माके पास जाना ।

आया चतुराननके पास । तासों कीन्ह सब्द परकासा ॥
ब्रह्मा चित दे सुनवे लीन्हा । पूछयो बहुत पुरुषको चीन्हा ॥
तबहि निरञ्जन कीन्ह उपाई । जेष्ट पुत्र ब्रह्मा मोर जाई ॥
निरञ्जन मन घंट विराजै । ब्रह्मा बुद्धि फेरि उपराजै ॥

ब्रह्मा बचन ।

निरंकार निर्गुण अविनासी । जोगि सरूप सून्यके वासी ॥
ताहि पुरुष कह वेद बखानें । आज्ञा वेद ताहि हम जानें ॥

कबीरसाहबका विष्णुकेपास पहुँचना ।

जब देखा तेहि काल दिढायो । तहँते उठ विस्नुपहँ आयो ॥
विस्नुहि कह्यो पुरुष उपदेशा । काल वशि नहि गहे संदेशा ॥

विष्णु बचन ।

कहे विस्नु मो सम को आही । चार पदार्थ हमरे पाही ॥
काम मोच्छ धरमारथ चारी । चाहे जौन देउँ मैं सारी ॥

ज्ञानी बचन ।

सुनुहु सोविस्नु मोच्छकस तोही । मोच्छ अच्छर परले तरहोही ॥
तुम नाहीं थिर थिर करा करहूँ । मिथ्या साखिकवन गुन भरहूँ ॥

कबीरसाहबका शेषनागके पास जाना ।

कबीरवचन धरमदास प्रति ।

रहे सकुच सुनि निर्भय बानी । निज हिय विस्नु आपडरमानी ॥
तब पुनिनाग लोक चलिगयऊँ । तासे कछु कछु कहिबे लयऊँ ॥