कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानीवचन शेषनागसे ।
पुरुष भेद कोउ जानत नाहीं । लागे सभे कालकी छाहीं ॥
राखनहार कहैं चीन्हहु भाई । जम सोको तुहिं लेइ छुडार्ई ॥
शेषनाग वचन ।
ब्रह्मा विस्नु रुद्र जिहि ध्यावैं । वेद जासुगुन निसि दिन गावैं ॥
सोइ पुरुष मंहि राखनहारा । कहाकरिहै जमराज बिचारा ॥
ज्ञानीवचन ।
जाहि कहहु तुम राखन हारा । सो तुमहिं लै करिहि अहारा ॥
राखनिहार और कोउ आही । करु विश्वास मिलाऊं ताही ॥
कबीरवचन धरमदास प्रति ।
सेष खानि विष तेज सुभाऊ । वचन प्रतीत हृदय नहिं आऊ ॥
सुनहु सुलच्छन धरमति नागर । तब मैं आयउँ या भवसागर ॥
आये जब मृत्यु मंडल माहीं । पुरुष अंक कहूँ देख्यो नाहीं ॥
कासो कहूँ पुरुष उपदेसा । सो तो अधिक अहै जम भेसा ॥
जो घातक ताको विस्वासा । जो रच्छक तेहि बोल उदासा ॥
जाको जपहिं सो धरि खाई । तब अस भाव चेत चित आई ॥
जीव मोह वस चीन्हत नाहीं । तब असभाव बरते हियमाहीं ॥
छन्द—अबहीं मेटि डारीं कालको, प्रगट कला दिखावऊँ ।
लेऊँ जीवन छोरि जमसों, अमर लोक पठावऊँ ॥
जाहि कारनमें रटत डोलों, सो न मोकहैं चीन्हई ।
कालके बस परे ये जिव सब, तजि सुधा विष लीन्हई ॥
सोरठा—पुरुष वचन अस नाहिं, यह सोच चित्त कीन्हैऊ ।
ले पहुँचावहु ताहि, शब्द परख दिढके गहे ॥
पुनि जस चरित भयो धरमदासा । सो सब वरनि कहों तुव पासा ॥
ब्रह्मादिके ध्यान द्वारा रामनामका प्राकट्य ।
ब्रह्मा विस्नु सम्भु सनकादी । सब मिलि कीन्ही सून्य समाधी ॥
कौन नाम सुमिरों करतारा । कवनहिं नाम ध्यान अनुसार ॥
सबहिं सून्य महीं ध्यान लगाये । स्वाति सनेह सीप ज्यों लाये ॥
तबहिं निरंजन जतन विचारा । सून्य गुफा ते शब्द उचारा ॥
रर्रा सब्द उठा बहु बारा । मा अच्छर माया संसारा ॥
दोउ अच्छर कहैं सम कै राखा । राम नाम सबहिंन अभिलाखा ॥