भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 218

रामनाम लै जगहि दिढायो । काल फन्द कोइ चीन्ह न पायो ॥
यहि विधि राम नाम उत्पानी । धरमनि परखि लेहु यह बानी ॥

धरमदास बचन ।

धरमदास कहे सतगुरु पूरा । छूटेउ तिमिर ज्ञान तुव सूरा ॥
माया मोह घोर अंधियारा । तामहँ जीव परे विकरारा ॥
जब तुव ज्ञान परगट होय भाना । छूटे मोह सब्द परमाना ॥
धन्य भाग हम तुम कहैं पाये । मोहि अधम कहैं लीन्ह जगाये ॥
अब यह कथा कहो समुझाई । सतजुग कौन जीव मुकताई ॥

सत्ययुगमें सतसुकृत (कबीर साहब) के

पृथ्वीपर आनेकी कथा ।

सतगुरु बचन ।

धरमदास सुनु सतजुग भाऊ । जिन जीवको नाम सुनाऊ ॥
सतजुग सत सुकृत मम नाऊँ । आज्ञा पुरुष जीव चेतताऊँ ॥

धोंधल राजाका वृत्तान्त ।

नृप धोंधल पहुँ मैं चलि गयऊ । सत्य शब्द सो ताहि सुनयऊ ॥
सत्य सब्द तिन हमरो माना । तिन कहैं दीन्ह पान परवाना ॥
छन्द— राय धोंधल संत सज्जन, सब्द मम दिढके गहो ।
सार सीत परसाद लीन्हों, चरन परसत जल लहो ॥
प्रेमसे गदगद भयो सब, तजेउ भर्म विभाव हो ।
सार शब्दहि चीन्ह लीनो, चरन ध्यान लगाव हो ॥

खेमसरीका वृत्तान्त ।

सोरठा—धोंधल शब्द चिताय, तब आयउ मथुरा नगर ।

खेमसरी आयो धाय, नारि त्रिध गोवालि सो ॥

कहे खेमसरि पुरुष पुराना । कहैवाते तुम कीन्ह पयाना ॥
तासों कहेउ सब्द उपदेसा । पुरुष भाव अरु जमको भेसा ॥
सुना खेमसरि उपजा भाऊ । जब चीन्हा सब जमका दाऊ ॥

खेमसरीको लोकका दर्शन कराना ।

पै धोखा इक ताहि रहाई । देखे लोक तब मन पतियाई ॥
राखेउ देह हंस लै धावा । पल इक मोहि लोक पहुँचावा ॥
लोक दिखाय हंस लै आयो । देह पाय खेमसरी पछतायो ॥
हे साहेब लै चलु वहि देसा । यहाँ बहुत है काल कलेसा ॥