भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 247

परगट देख चीन्हे नहि मूढा । परे कालके फन्द अगूढा ॥
जैसे स्वान अपावन रंवेउ । तिमिजगअमीछोडिविषखांचेउ ॥
नृपति युधिष्ठिर द्वापर राजा । तिनपुनिकीन्हजग्यको साजा ॥
बन्धु मार अपकीरति कीन्हा । ताते जग्य रचन चित दीन्हा ॥
क्रिस्त केर जब आज़ा पाई । तब पांडव सब साज मंगाई ॥
जग्यकी सामग्री गहि सारी । जहाँ तहाँते सब साधु हंकारी ॥
पांडव प्रति बोले जदुपाला । पूरण जग्य जान तिहि काला ॥
घंट अकास बजत सुनि आवे । जग्यको फल तब पूरन पावे ॥
संन्यासी बैरागी झारी । आये ब्राह्मण औ ब्रह्मचारी ॥
भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सर्बहि जेवाई ॥
इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घंट नहि बाजा राय लजावा ॥
जबही घट न बाज अकासा । चकित भयो राय बुद्धि नासा ॥
भोजन कीन सकल रिषिराया । बजा न घंटा भूप भ्रम आया ॥
पांडव तबहि क्रिस्त पहुँ गयऊ । मन संसय करि पूछत भयऊ ॥

युधिष्ठिर वचन ।

करिके किरपा कहो जदुराजा । कारन कौन घंट नहि बाजा ॥

कृष्ण उत्तर ।

क्रिस्त अस कारन तासु बताया । साधू कोई न भोजन पाया ॥

यधिष्ठिर वचन ।

चकित हो तब पांडव कहेऊ । कोटिन साधु भोजन लहेऊ ॥
अब कहैं साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले जदुनाथा ॥

कृष्ण वचन ।

सुपच सुदरसनको लै आवो । आदर मान समेत जिमावो ॥
सोई साधु और नहि कोई । पूरन जग्य जाहिते होई ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

क्रिस्त आज़ा जब अस पयऊ । पांडव तब ताके ढिग गयऊ ॥
सुपच सुदरसन को लै आये । विनय प्रीतिसे ताहि जेवाँये ॥
भूप भवन भोजन कर जबहीं । बजा अकासमें घंटा तबहीं ॥
सुपच भगत जब आस उठावा । बाजो घंट नाम परभावा ॥
तबहुँ न चीन्हे सतगुरु बानी । बुद्धि नास जम हाट बिकानी ॥
भगत जीव कहैं काल सताये । भगत अभक्त सबन कहैं खाये ॥