कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextक्रिस्न बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बन्धु घात पांडव तब कीन्हा ॥
पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहि जग्य करावा ॥
ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजी हिमालय तिन्हें गलावा ॥
चार बन्धु सह द्रोपदि गलेऊ । उबरे सत्य जुधिष्ठिर रहेऊ ॥
अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस् कीन्हा अपमाना ॥
बलि हरिचन्द्र करन बड दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥
जिव अचेत आसा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥
कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥
मुक्ति जानि जिव आसा लावें । आसा बांधि काल मुख जावें ॥
सब कहैं काल नचावे नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं वाचा ॥
जो रच्छक तेहि खोजे नाहीं । अन चीन्हें जमके मुख जाहीं ॥
बार बार जीवन समझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥
अस जम बुद्धि हरी सबकेरी । फंद लगाय जीव सब घेरी ॥
सत्य सबद कोई परखे नाहीं । जमदिसि होय लरै हम पाहीं ॥
जब लगि पुरुष नाम नहिं भेटे । तब लगि जनम भरन नहिं भेटे ॥
पुरुष प्रभाव पुरुष पहुँ जायी । क्रित्रिम नामते जम धरि खायी ॥
पुरुष नाम परवाना पावे । कालहिं जीत अमर घर जावे ॥
छंद—सत नाम परताप धर्मनि, हंसलोक सिधावई ।
जन्म मरनको कष्ट मेटै, बहुरि न भव जल आवई ॥
पुरुषकी छवि हंस निरखहिं, लहे अति आनंद घना ।
अंशहंस मिल करे कुतूहल, चंद्रकुमुदिनि सँग बना ॥
सोरठा—जैसे कुमुदिनि भाव, चन्द्र देखि निशि हरषई ।
तैसइ हंस सुख पाव, पुरुष दरसके पावत ॥
नहीं मलीन मुख भाव, एकप्रभाव सदा उदित ।
हंस सदा सुख पाव, सोक मोह दुख छनक नहिं ॥
जबै सुदरसन ठेका पूरा । ले सत लोक पठाया सूरा ॥
मिले रूप सोभा अधिकारा । अरु हंसन संग कुतूहल सारा ॥
षोडस भानुरूप तब पावा । पुरुष दरस सो हंस जुडावा ॥
उस कालमें एक तो श्वपचसुद'शॉन और दूसरे शिष्य गरुडजी हुए । ये