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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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क्रिस्न बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बन्धु घात पांडव तब कीन्हा ॥
पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहि जग्य करावा ॥
ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजी हिमालय तिन्हें गलावा ॥
चार बन्धु सह द्रोपदि गलेऊ । उबरे सत्य जुधिष्ठिर रहेऊ ॥
अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस् कीन्हा अपमाना ॥
बलि हरिचन्द्र करन बड दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥
जिव अचेत आसा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥
कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥
मुक्ति जानि जिव आसा लावें । आसा बांधि काल मुख जावें ॥
सब कहैं काल नचावे नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं वाचा ॥
जो रच्छक तेहि खोजे नाहीं । अन चीन्हें जमके मुख जाहीं ॥
बार बार जीवन समझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥
अस जम बुद्धि हरी सबकेरी । फंद लगाय जीव सब घेरी ॥
सत्य सबद कोई परखे नाहीं । जमदिसि होय लरै हम पाहीं ॥
जब लगि पुरुष नाम नहिं भेटे । तब लगि जनम भरन नहिं भेटे ॥
पुरुष प्रभाव पुरुष पहुँ जायी । क्रित्रिम नामते जम धरि खायी ॥
पुरुष नाम परवाना पावे । कालहिं जीत अमर घर जावे ॥

छंद—सत नाम परताप धर्मनि, हंसलोक सिधावई ।

जन्म मरनको कष्ट मेटै, बहुरि न भव जल आवई ॥

पुरुषकी छवि हंस निरखहिं, लहे अति आनंद घना ।

अंशहंस मिल करे कुतूहल, चंद्रकुमुदिनि सँग बना ॥

सोरठा—जैसे कुमुदिनि भाव, चन्द्र देखि निशि हरषई ।

तैसइ हंस सुख पाव, पुरुष दरसके पावत ॥

नहीं मलीन मुख भाव, एकप्रभाव सदा उदित ।

हंस सदा सुख पाव, सोक मोह दुख छनक नहिं ॥

जबै सुदरसन ठेका पूरा । ले सत लोक पठाया सूरा ॥

मिले रूप सोभा अधिकारा । अरु हंसन संग कुतूहल सारा ॥

षोडस भानुरूप तब पावा । पुरुष दरस सो हंस जुडावा ॥

उस कालमें एक तो श्वपचसुद'शॉन और दूसरे शिष्य गरुडजी हुए । ये

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