कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 249, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंदोनों शिष्य बड़े प्रसिद्ध हुए और तीसरे दुर्वासा ऋषि । इन तीनोंकी खबर मुझको है और इनके अतिरिक्त जो और चले कबीर साहबके उस समयमें हुए उनका वृत्तान्त मुझको मालूम नहीं हैं । उस समय कबीर साहब कृष्णजीको और सहस्रों ऋषयों मुनियोंको उपदेश देते फिरे, जिसने आपका उपदेश सुना और कहना माना, वह परमधामको पहुँचा और जिसको विश्वास नहीं हुआ वह कालका भोजन बना ।
दूसरीबार कलियुगमें कबीर साहबके पृथ्वीपर प्रगट होनेका वृत्तान्त ।
धर्मदास बचन ।
हे साहिब इक विनती मोरी । खसम कबीर कहु बंदीछोरी ॥
भगत सुदरसन लोक पठाया । पाछे साहिब कहां सिधाया ॥
सो सतगुरु मुहि कहो संदेशा । सुधा वचन सुनि मिटै अँदेशा ॥
कबीर बचन ।
अब सुनु धर्मनि परम पियारा । तुमसो कहों आगल व्यवहारा ॥
द्रापर गत कलिजुग परवेशा । पुनि हम चल जीवन उपदेशा ॥
धरमराय कहैं देखो आई । मोहिं देखि जम गयो मुरझाई ॥
धर्मराय बचन ।
कहे धरम कस मोहिं दुखावहु । बच्छ हमार लोक पहुँचावहु ॥
तीनों जुग गवने संसारा । भवसागर तुम मोर उजारा ॥
हार वचन पुरुष मोहि दीन्हा । तुम कस जीव छुडावन लीन्हा ॥
और बन्धु जो आवत कोई । छिनमहैं ता कहैं खात बिलाई ॥
तुमते कछू न मोर बसाई । तुम्हरे बल हंसा घर जाई ॥
अब तुम फिर जाहु जगमाहीं । शब्द तुम्हारा सुनै कोउ नाही ॥
करम भरम हम उसकें ठाटा । जात कोइ न पावै बाटा ॥
घर घर भरम भूत उपजावा । धोका दै दै जीव नचावा ॥
भरम भूत हो सब कह लागे । तोहि चिन्है ताकहैं भ्रम भागे ॥
मद्य मांस खावैं नर लोई । मद्य मांस प्रिय नरको होई ॥
आपन पंथ मैं कीन परगासा । मांस मद्य सब मानुस ग्रासा ॥
चंडी जोगिन भूत पुजाओ । यही भरम महैं जग जहैं डाओ ॥
बांधि बहु फंदहि फंद फंदाओ । अंत काल कर सुधि बिसराओ ॥
तुम्हरी भगति कठिन है भाई । कोई न मनिहैं कहैं बुझाई ॥