भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 253

तुम जाकर उसको ले लो । तब समुद्र प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे पीछे पलटा और द्वारकापुरीको डुबा लिया । तबतक उधर जगन्नाथजीका मन्दिर बनकर पूरा हो चुका ।

जगन्नाथ मन्दिरकी स्थापनाका वृत्तान्त । (अनु०)

धर्मदास बचन ।

कह धर्मनि प्रभु मोहि सुनाओ । आगलचरित्र कहि समझाओ ॥

कबीर बचन धर्मदास प्रनि ।

राजा इन्द्रदमन तेहि काला । देश उड़ैसे को महिपाला ॥

सतगुरु बचन ।

राजा इन्द्रदमन तहैं रहई । मंडपकाज युगति सो कहई ॥

क्रिस्त देह छांडी पुनि जबही । इन्द्रदमन सपना भा तबही ॥

कृष्णका इन्द्रदमन राजाको सपना देना ।

स्वप्नेमें हरि अस ताहि बताई । मेरो मन्दिर देहु उठाई ॥

मोकहैं स्थापन कर राजा । तोपहैं मैं आयउ यहि काजा ॥

राजा यहि विधि सपना पाई । ततछन मण्डप काम लगाई ॥

मण्डप उठा पूरन भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा ॥

जब जब मन्दिर लाग उठावे । क्रोधवन्त सागर तब धावे ॥

छनमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथ को मन्दिर तोरे ॥

मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहि लेत डुवाई ॥

हारा नृप करि बहुत उपायी । हरिमन्दिर तहैं उठै न भाई ॥

मन्दिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मनमांहि सम्हारी ॥

हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहां हम जायी ॥

आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीवन मोही चीन्हा ॥

पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहां बनायउ जाई ॥

इन्द्रदमन तब सपना पावा । अहो राय तुम काम लगावा ॥

मंडप शंक न राखो राजा । इहैंवा हम आये यहि काजा ॥

जाहु वेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु बचन हमारा ॥

राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चलि आयो ॥

सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोध चित धारा ॥

उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहन न पावे ॥