भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 255

अब तुमलोग आकर मेरी पूजा करो । स्वप्न देखने पर पंडा घरसे चलकर पहले समुद्रतट पर कबीर चौतरेपर गया । वहाँ उसने कबीर साहबको बैठा देखा उस समय सत्यगुरुका वेष जिन्दाका था वैष्णव वेष नहीं था । जिन्दा वेषके साधु प्रायः मुसलमानोंमें होते हैं, इस कारण वह वेष देखकर उस ब्राह्मणने अपने मनमें भ्रम किया कि, प्रथम मैंने म्लेच्छका ही दर्शन किया, ठाकुरका दर्शन नहीं मिला । ऐसा संशय करके वह पण्डा तो ठाकुरके मन्दिरको चला गया । इधर कबीर साहबने उसके मनकी समस्त बातें जान लीं । जब वह पण्डा ठाकुरके मण्डपमें आया, तब उसका वहाँ विचित्र कौतुक दिखलायी दिया । ठाकुरका समस्त मंदिर कबीर साहबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । जिस ओर वह ब्राह्मण देखता उधर वहीं कबीर साहबकी मूर्तिको उपस्थित पाता है ठाकुरकी मूर्ति कहीं दिखलाईही नहीं देती । वह ब्राह्मण अक्षत और पूष्प लिये चकित होकर खड़ा रह गया कि, मैं किसकी पूजा करूँ, ठाकुर तो कहीं दिखलाई नहीं देते, समस्त मंदिर कबीर साहबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । वह अपने मनमें सोचने लगा कि, इसका क्या कारण है ? अन्तमें उसने अपने दोषको जान लिया कि, मैंने जो कबीर साहब को म्लेच्छ समझा था । इस कारणही मुझको यह दंड मिला है । यह सोच समझकर वह ब्राह्मण कबीर साहबकी स्तुति करने और अपने अपराधके लिये क्षमा प्रार्थना करने लगा । जब पण्डाने सत्यगुरुकी अत्यंत स्तुति की और अत्यंत नम्रता-पूर्वक अपने दोषोंके निमित्त क्षमा प्रार्थना किया, तब आप दयालु हुए और अपनी सब मूर्तियोंको समेट लिया, केवल एक मूर्ति रह गयी और ठाकुरकी मूर्ति दिखाई देने लगी । तब कबीर साहबने उस ब्राह्मणसे कहा कि, ऐ पंडा ! अब मेरी आज्ञा है कि, तुम ठाकुरको पूजो, पर इस बातका ध्यान रखना कि, आजके दिनसे इस जगन्नाथपुरी में छूत न रहेगी और जाति-पातिका भेद तनिक भी नहीं रहेगा । प्रत्येक जाति एक दूसरे जातिके साथ निधड़क भोजन करेगी । सो अब तक पुरुषोत्तम पुरीमें वही नियम प्रचलित है । सब जातिके लोग एक स्थानपर भोजन करते हैं, कोई किसीके जूठेका कुछभी ध्यान नहीं करता । इतनी बात कहकर कबीर साहब तो वहाँसे अन्तर्धान हो गये, और जगन्नाथकी पूजा संसारमें प्रचलित हुई ।

मंडप काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहँवा कियऊ ॥
तब हरि पंडन स्वपन जनावा । दास कबीर मोहि पहुँ आवा ॥
आसन सागर तीर बनायी । उदधि उमंग नीर तहँ आयी ॥
दरस कबीर उदधि हटि गयऊ । यहि विधि मंडप मोर बचयऊ ॥