भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 256

पंडा उदधि तीर चलि आये । करि अस्नान मंडप चल जाये ॥
चौरातीर पहुँचे जब पण्डा । मोहि देखि मन धरे पखंडा ॥
पंडन अस पाखंड लगायी । प्रथम दरस मलेच्छ दिखायी ॥
हरिके दर्शन मैं नहि पावा । प्रथमहि हम चौरा लग आवा ॥
तब हम कौतुक एक बनाये । कहों वचन नहि राखु छिपाये ॥
मंडप पूजन पंडा गयऊ । तहवों एक चरित अस भयऊ ॥
जहँ लग मूरति मंडप माहीं । भये कबीर रूप धर ताहीं ॥
हरि मूरति कहँ पंडा देखा । भये कबीर रूप धर भेखा ॥
अच्छत पुहुप ले विप्र भुलाई । नहि ठाकुर कहँ पूजहुँ भाई ॥
देखि चरित्र विप्र सिर नाया । हे स्वामी तुम मरम न पाया ॥
पंडा वचन ।

हम तुम काहि नहीं मन लाया । ताते मोहि चरित्र दिखाया ॥
छमा अपराध करो प्रभु मोरा । विनती करें दौड़ कर जोरा ॥

कबीर वचन ।

छन्द— वचन एक मैं कहों तोसो, विप्र सुन तैं कान दे ।
पूज ठाकुर दीन्ह आयसु, भाव दुविधा छाड़ दे ॥
भ्रम भोजन करे जो जिव, अंग हीन हो साहिको ।
करे भोजन छूत राखे, सीस उलटे वाहिको ॥

सोरठा—चौरां करि व्यवहार, भ्रम विमोचन ज्ञान दूढे ।
तहँते कियो पसार, धर्मदास सुनु कानदे ॥

सातवाँ प्रकरण ।

स्वामी रामानुजाचार्य और जगन्नाथपुरी ।

वैष्णवाचार्य रामानुज स्वामी जब उत्पन्न हुए और अपना धर्म पृथ्वीपर प्रचलित किया, तब दक्षिण देशमें उनके धर्मका अच्छा प्रचार हुआ । जब आप पुरुषोत्तमपुरमें गये और यह इच्छा की कि, इस जगन्नाथपुरीमें आचार चलाऊँ । तब रामानुज स्वामीसे जगन्नाथजीने स्वप्नमें कहा कि, मेरी पुरीमें तुम्हारा आचार नहीं चलेगा, तुम इस ध्यानको अपने मनसे निकाल दो, परन्तु रामानुज-स्वामीने इस विचारको नहीं त्यागा । जब एक रातके समय रामानुज-स्वामी सोगये तब जगन्नाथजीने उनको जगन्नाथपुरीसे उठाकर श्रीरंगपुरीमें धर दिया । जब प्रातःकाल स्वामीजी उठे तब देखा कि, मैं श्रीरंगपुरीमें आन