भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पहुँचा । तब उन्होंने अपने विचारोंको छोड दिया और पुरुषोत्तमपुरमें आचार नहीं चला । इस बातको जो कोई जानना चाहे वह भक्तमालको देखले ।

आठवाँ प्रकरण ।

तीसरी बार कलियुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर प्रगट होना
और शवपत्र सुदर्शनके माता-पिताको मुक्तिका उपदेश
देना और बालरूप धारण करके कमलोंके पुष्पोंमें
तालाबपर लक्ष्मणा ब्राह्मणीको मिलनेकी कथा ।

शवपत्र सुदर्शनजी कबीर साहबके शिष्य हुए परन्तु उनके माता पिता नहीं हुए । जब सुदर्शनजीकी देह छूटी और सत्य लोकको गये, तब उन्होंने सत्य-कबीरसे निवेदन किया कि, हे सद्गुरु ! मेरे माता पिताकी मुक्ति करो । तब कबीर साहब उनका निवेदन स्वीकार करके पृथ्वीपर आये । शवपत्रके जो माता पिता थे वह दोनों डोमका शरीर छोडकर ब्राह्मण और ब्राह्मणी हुए थे, और चन्द्रवारे नगरमें रहते थे । पहले उनका नाम कुलपति और महेसरी फिर नरहर लक्ष्मणा हुआ । इस चन्द्रवारे नगरके तडागमें कबीरसाहब कमलोंके पुष्पोंमें एक छोटे बच्चेकी सूरत होकर रहे । प्रातःकाल वह ब्राह्मणी जब स्नान करनेको आयी तब स्नानादिसे निवृत्त होकर अपना अंचल पसारकर सूर्य भगवान्से पुत्र मांगने लगी क्योंकि, वह निःसंतान थी । उसी समय गुप्तरीतिसे कबीरसाहब उस ब्राह्मणीके अंचलपर आगये । इसपर उस ब्राह्मणीको निश्चय हुआ कि, सूर्य भगवानने मुझको बेटा दिया है वह पुत्रको लेकर अपने घरको आयी । ब्राह्मण ब्राह्मणी दोनों प्रसन्न होकर सेवा करने लगे । जब कबीर साहबको रात्रिके समय पलंगपर लेटाते और प्रातःकाल बिछौना झाड़ते तब प्रति दिवस एक तोला सुवर्ण बिछौनेके नीचेसे निकल पड़ता । इस प्रकार वे ब्राह्मण तथा ब्राह्मणी धनाढ्य होगये, और कबीर साहबकी दयासे उनका दारिद्र्य दूर हो गया । देखो ग्रंथ अनुरागसागर और निर्भयज्ञान इत्यादि वहाँ यह कथा विस्तारसे है । प्रमाण आगे ।

जब कबीर साहब, कुछ बड़े हुए तब दोनोंको सिखलाने लगे कि मैं तुम्हारा गुरु हूँ, तुम हमारा शब्द मानो तो मैं तुम्हारा उद्धार करूँगा और तुम्हारे आवा-गमनका बंधन टूट जावेगा । पर उन दोनोंको सत्यगुरुके कहनेका निश्चय नहीं हुआ । बालक जानकर कहना नहीं माना, तब कबीर साहब उनके गृहसे अन्तर्धान हो गये ।