कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextचालीसवाँ प्रकरण ।
बालक कबीरका दूध पीना ।
बिना भोजनादि किये ही कबीर साहबका शरीर बड़ा होता जाता था और दिन प्रति आपका तेज तथा प्रताप बढ़ता जाता था । प्रमाण गरीबदासजी—
“दूध पिवे न अन्न भखे, नहिं पलन झूलंत ।
अधर अमान ध्यानमें, कमल कला फूलंत ॥”
जब जोलाहा जोलाहीने देखा कि, बालकको तो कुछ भोजन करने की आवश्यकता नहीं है और प्रति दिवस उसका सौन्दर्य उन्नतिपर है तब वे अपने मनमें अत्यंत चिंतित होकर कहने लगे कि ऐ कबीरजी ! आप कुछ भोजन करो यदि आप अन्न न खाओगे तो हम भी नहीं खायेंगे, यों दोनों कंदन करने लगे । तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि ऐ नीरू ! गायकी एक कोरी बछिया और कुम्हारके घरसे एक कोरा बरतन लेआ । कबीर साहब की अज्ञानुसार नीरू गया और कोरी बछिया दूँढ़कर और कुम्हार के गृहसे एक बरतन ले आया । तब कबीर साहबने उस जोलाहेसे कहा कि, इस बछियाको मेरे सामने बाँध दो और उसके स्तनोंके नीचे बरतन रखदो । जोलाहेने वँसाही किया तब बालक कबीर साहबने उस बछियाकी ओर देखा तो उसके स्तनोंमें से दूध निकलने लगा और बरतन भर गया । वह दूध लेकर नीरूने कबीर साहबके सामने रख दिया तिसको आपने पीलिया । उसी प्रकार नीरू प्रतिदिवस किया करता था ।
निर्भयज्ञानमें इसी बालको इस प्रकार लिखा है कि, जब बालक कबीर कुछ खाते पीते नहीं थे, तब नीमा नीरूको बड़ा दुःख हुआ, सबसे वह पूछते फिरते कि, भाई ! हमारे घर जो अजीब बालक आया है, कुछ खाता पिता नहीं है, यद्यपि इससे उसके शरीरमें कुछ कमी नहीं दीखती बल्कि शरीर तो दिन दूना रात चौगुना तेजोभय और पुष्टही होता जाता है, तथापि हम लोगोंका मन नहीं मानता, कोई कुछ उपाय बतलावे तो हमें संतोष हो । यद्यपि नीमा नीरूकी बातोंको सुनकर प्रत्येक अपनी अपनी बुद्धि अनुसार कुछ न कुछ बतलाता और वे अनेक प्रयोग करते भी किन्तु जब बहुत उपाय करके थके तब निराश हो बहुत दुःखी हुए । अंतमें किसीने उन्हें सलाह दी कि, स्वामी रामानन्दजी वर्तमान कालमें बड़े सिद्ध और महात्मा त्रिकालदर्शी हैं, तुम उनके पास