कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 285, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख ।
कासीके काजी कहैं, नई दीन की टेक ॥”
जब काशीके सब काजियोंको यह समाचार मिला तो वे इस समाचार-को सुनकर बड़े ही चिन्तित हुए । वे परस्पर कहने लगे कि, अत्यंत आश्चर्यका विषय है, यह कैसा अद्भुत व्यापार है ? समस्त कुरानमें कबीर ही कबीर दिखाई देता है, अब कौनसा उपाय करना चाहिये कि, ऐसे दरिद्री जोलाहेके पुत्रका इतना बड़ा नाम न रखवा जावे । यह बात अच्छी नहीं है, फिर फिर कुरान खोलकर देखते तो यही चारों नाम निकलते, इन चारों नामोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं निकलता ।
उनचालीसवाँ प्रकरण ।
काजियोंका नीरूको कबीरको कत्ल करनेकी सलाह देना ।
तब काशीके काजियोंने आपसमें सम्मति करके नीरू से कहा कि, ऐ नीरू ! तू इस बालकको अपने घरके भीतर लेजाकर मार डाल नहीं तो तू काफिर हो जायगा तब वह जोलाहा कबीर साहबको अपने घरके भीतर लेगया और मार डालनेके लिये उनके गले पर छुरी मारना आरम्भ किया वह छुरी गलेमें एक ओरसे दूसरी ओर पार निकल गयी, न कोई जखम हुआ और न रक्तका एक बूंदही निकला, न गर्दन पर कोई चिन्हही हुआ । ऐसा जान पडा मानो हवामें छुरी चली ।
तब कबीर साहब बोले कि, ऐ नीरू ! मेरा कोई माता पिता नहीं है । न मैं जन्मता हूँ, न मरता हूँ न मुझको कोई मार सकता है, न मैं किसीको मारता हूँ, न मेरा शरीर है । यह शरीर जो दिखलाई देता है, वह तुम्हारी भावना मात्र शब्दरूपी है । न मेरे मांस चर्म हड़डी और रक्त है, मैं स्वयम् परमात्मा हूँ । यह बात सुनकर जोलाहा और जोलाहिन अत्यंत भयभीत हुए और समस्त काशीमें हुल्लड मच गया कि, नीरूके गृहपर जो बालक है वह वार्तालाप करता है ।
अन्तमें विवश होकर कबीरही नाम ठहराया गया और किसीका कुछ वश न चला कि, उसको बदल सके और सबको भय उत्पन्न हुआ देखो गरीब-दासजीकी वाणीमें ।